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वाराणसी। वसंत महिला महाविद्यालय में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह  एवं काव्यपाठ में  बतौर विशिष्ट अतिथि के रूप में जेएनयू .हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो ओपी सिंह ने कहा कि मुक्तिबोध अंतःकरण के कवि हैं।अगर हम उनके अंतःकरण की बात करें तो पायेंगे की उनका आयतन बहुत बड़ा है। मुक्तिबोध का संघर्ष जितना बड़ा है उनका संवेग भी हटाना बड़ा है।

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मुक्तिबोध ने अनेक प्रकार के संवेगों को एक सूत्र में पिरो देने का श्रमसाध्य किया है। उनका मूल्यांकन केवल फैंटेसी से नहीं कर सकते।मुक्तिबोध संवेगों, आवेगों के बड़े कवि हैं। मुक्तिबोध ने आलोचना पर बड़ा काम कामायनी पर किया है। कामायनी एक पुनर्विचार नामक पुस्तक लिखते समय द्वंद्वात्मक भौतिकवादी सिद्धांतों को जीते हैं।

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उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध का रचनात्मक संघर्ष साहित्य के विविध विधाओं में फैला हुआ है। कवि अक्सर अंधेरे से निकलने की छटपटाहट में होता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मराक्षस मुक्तिबोध का सबसे प्रिय शब्द है। यह शब्द उनकी कविता और कहानी दोनों में मिलता है।

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दक्षिण हिंदी प्रचार सभा चेन्नई के कुलपति प्रो राममोहन पाठक ने कहा कि मुक्तिबोध समय के सेतु थे उनका पूरा जीवन संघर्षमय था।मुक्तिबोध गांधी के बड़े समर्थक थे। इनका साहित्य और पत्रकारिता दोनों के बीच निरंतर आवाजाही रहा है।

विशिष्ट अतिथि प्रो.कैलाश नारायण तिवारी ने कहा कि मुक्तिबोध को समझने के लिए उनके वैचारिक धरातल, आलोचनात्मक धरातल और राजनैतिक धरातल को समझना होगा। विशिष्ट वक्ता प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि मुक्तिबोध एक ढर्रे के कवि हैं। वह घूम फिर के एक ही विषय पर आ जाते थे। उनकी कविताओं में केवल एक ही हीरो था वह है ‘विचार ‘। उन्होंने गरीबी को बहुत झेला है। मुक्तिबोध एक ऐसे बड़े कवि हैं जिन्होंने अपने समय में फांसिज्म की पग ध्वनियां सुनी थी। वे अपनी कविताओं में जनता के वरीयता की बात करते हैं। मुक्तिबोध भीतर तक डूबे रहने वाले कवि थे और बाहर से पूरी तरह सचेत भी थे।

विशिष्ट वक्ता प्रो.वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने कहा कि मुक्तिबोध मार्क्सवादी कवि थे, लेकिन दुख इस बात का है कि एक बड़े कवि की रचनाएं मरने के बाद प्रकाशित होती हैं। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को पढ़ते समय हम एक साथ कई कवियों तुलसीदास, निराला और खुद मुक्तिबोध को पाते हैं।

गोष्ठी की अध्यक्षता कर रही वरिष्ठ साहित्यकार प्रो चंद्रकला त्रिपाठी ने कहा कि मुक्तिबोध की कविताओं में पूर्णता है। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध मार्क्सवादी थे वह हमेशा मुक्ति  की बात करते थे। समता और समानता की बात करते थे। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध क्रांति की निरंतरता रचने वाले कवि हैं।जैसे प्रेमचंद ने मनुष्यता को समझा था वैसे मुक्तिबोध समझते हैं। मुक्तिबोध ने जनता की चेतना का जो पिछड़ा पन है उसे उसे भूल कहते हैं। मुक्तिबोध की कविताएं आप को सुकून नहीं देती हमेशा बेचैन करती हैं।वे वर्तमान को बहुत बड़ी सुसंगत देना चाहते थे।

कार्यक्रम की संयोजिका प्रो.शशिकला त्रिपाठी ने कहा कि मुक्तिबोध खतरों के कवि थे।वे जीवन भर खतरे का जोखिम उठाते रहे। मुक्तिबोध भारतीय लोकतंत्र के घिरते चरित्र को देख कर बहुत दुखी थे।वे हमेशा बेचैन रहने वाले कवि थे। वे अन्तस चेतस ही नहीं विश्व चेतस कवि थे।

मुक्तिबोध आधुनिक हिंदी कवियों के लिये बहुत बड़ी सीख रहे है।मुक्तिबोध के कविता के भीतर आत्मा की पुकार सुनाई पड़ती है। यह पुकार देश की संस्कृति की पुकार है। मुक्तिबोध भविष्य द्रष्टा कवि है। उनकी कविता में एक ऒर किसान ,मजदूर ,मेहतर है तो दूसरी ओर मध्यवर्ग हैं।

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