औड़िहार : 1600 साल पहले यहीं हुआ था भारत को महाविनाश से बचाने के लिये भीषण महासंग्राम

प्रो डॉ राकेश उपाध्याय

स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य पर यह आलेख प्रोफेसर राकेश उपाध्याय, भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के परिश्रम पूर्ण शोध पर आधारित है। प्रो उपाध्याय इस विषय पर सीरीज लिख रहे हैं। प्रस्तुत है भूमिका और आलेख का भाग-एक।

संसार भर के महानतम योद्धाओं में स्कंद गुप्त विक्रमादित्य जैसा योद्धा दूसरा नहीं। सम्राटों में बाहुबली जैसा महा सम्राट, भारत के शत्रुओं के विरुद्ध महाशत्रु जिसने बर्बर हूणों की भीषण दुर्दांत टक्कर से लहुलूहान हो चुके भारत को अपने बाहुबल के द्वारा महाविनाश से बचा लिया।

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पूरी दुनिया में मचा रखी थी तबाही
जिन हूणों के आघात मात्र से विश्व विजेता सिकंदर के मरने के 100-150 साल बाद ही ग्रीक देश यूनान भस्मिभूत होकर इतिहास का किस्सा बन गया, हूण सेनाओं के भयानक अत्याचारों से जब समूचा यूरोप थर्रा उठा और देखते ही देखते रोमन साम्राज्य मटियामेट होकर सदा के लिये अतीत का हिस्सा बन गया। वही खूंखार हूण रुस के भूगोल को रौंदते अट्ठहास करते बढ़े तो वोल्गा नदी रूसियों के रक्त से लाल हो उठी। हूणों की बर्बरता देखकर महाकाय चीन भयाक्रांत हो उठा और चीन के लाखों लोग द ग्रेट वॉल ऑफ़ चाईना बनाने में जुट गए।

तक्षशिला को ध्वस्त करके गंगा-यमुना के मैदान में पहुंच गये थे बर्बर हुण
वही बर्बर हूण तब भारत भूमि पर टिड्डि दल की तरह टूटे। तक्षशिला विश्वविद्यालय को ध्वस्त करते लूटमार और मारकाट करते हुए गंगा यमुना के मैदान में कहर बरपाते बाहुबली फिल्म में वर्णित कालकेय की सेना सदृश भारत के तत्कालीन केंद्र पाटलिपुत्र को कब्जे में लेने के लिये चढ़ चले।

स्कंदगुप्त ने लिया था लोहा
तब जिस 25वर्षीय गुप्तवंशैकवीर ने अपने बुजुर्ग हो चुके पिता सम्राट कुमार गुप्त के निर्देश पर चतुरंगिणी सैन्यबल के सेनापति के रूप में हूणों से टकराने और उन्हें गंगा पार वाराणसी, गाजीपुर और बलिया के किनारे वाले गंगा तट पर ही सदा के लिये समाप्त करने का बाहुबली संकल्प लिया, वह युवक कोई और नहीं बल्कि स्कन्द गुप्त विक्रमादित्य ही था।

हुणों का नाश करके स्थापित किया था विजय स्तंभ
ईस्वी सन 455 यानी आज से करीब 1600साल पहले उस महा नायक ने भारत की धरती पर हूणों के समूल नाश के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ स्थापित किये। उसने इसी भितरी, गाजीपुर से हूणों के विनाश के महायज्ञ को प्रारंभ कर इसकी पूर्णाहुति का कार्य गुजरात के सौराष्ट्र के जूनागढ़ में संपन्न किया।

अगर स्कंदगुप्त न होते तो… ?
उसकी पावन स्मृति को नमन करता हूं तो आंख भर आती है कि वह अकेला न होता तो यह भारत ही कहां होता। यूनान मिस्र और रोम की तरह केवल हम भी इतिहास में ही रहे होते। उस महानायक की स्मृति को नमन करने मैं बार बार भितरी जाता रहता हूं, वीरता का यह जागृत तीर्थ मुझे बार बार खुद से मिलने के लिये बुलाता है।

स्थानीय निवासी भूल चुके हैं शौर्यगाथा
इस बार भितरी गया तो यहां की हालत देखकर दुख हुआ। उस अमर सेनानी की स्मृति पर बकरे और बकरियों की टोलियाँ घूमती हैं, गांव के स्थानीय युवकों को बुलाकर मैंने वार्ता की, किसी को भी उस महा योद्धा के बारे में कुछ पता नहीं। हां कुछ ने स्कंद गुप्त का नाम अवश्य बताया। कभी कभी सोचता हूं कि स्कंद गुप्त की स्मृति के साथ यह अन्याय क्यों जबकि वह संसार के सम्राटों में इकलौता है जिसने विश्व इतिहास में बर्बरता का अध्याय बन चुके हूणों को सदा सदा के लिये खामोश कर दिया। (स्कंद गुप्त की कहानी आप कहेंगे तो पूरे शोध के साथ आपको सुनाऊंगा)

सैदपुर भितरी में महाराज स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का विजयस्त्ंभ स्थल

स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य की कथा- भाग 1


वाराणसी से गोरखपुर जाइए तो सड़क के रास्ते या रेल के रास्ते वाराणसी से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित औड़िहार जंक्शन पर हर ट्रेन और बस ठहरती है। भारतीय इतिहास के वीर प्रवाह को समझने के लिए यह स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। बिल्कुल गंगा के किनारे बसा यह छोटा सा गांव मध्य एशिया के बर्बर हूणों के समूल विनाश का साक्षी है। गंगा की कलकल धारा के किनारे सदियों पहले यह वीरान गांव आज भी आबादी के लिहाज से बहुत ही छोटा है, किन्तु यहां के क्षत्रियों समेत चारों वर्णों की कीर्ति पताका पूर्वांचल के इलाके में सबसे अधिक चर्चित रहती है।

तो इसलिये पड़ा औड़िहार नाम
पता नहीं कि यहां बसी आबादी के लोग ये जानते हैं कि नहीं कि उनके गांव का नाम औड़िहार क्यों पड़ा लेकिन इतिहास साक्षी है और औड़िहार के पास सैदपुर-भितरी नामक गांव में मौजूद स्कन्दगुप्त की लाट गवाही देती है कि यह औड़िहार वही स्थान है जहां बर्बर हूणों की फौज को स्कन्दगुप्त ने अपने बाहुबल से प्रबल टक्कर दी, ऐसी चोट पहुंचाई थी हूणों को कि इस जगह का नाम ही हूणिहार या हुणिआरि पड़ गया। मतलब वह जगह जहां हूणों की हार हुई, जहां हूणों की पराजय का इतिहास लिखा गया, जो भूमि दुर्दांत हूणों के लिए अरि यानी शत्रु समान खड़ी हो गई, वह जगह ही आज अपभ्रंश रूप में औड़िहार के रूप में मौजूद है।

पूर्वोत्तर रेलवे का औंडिहार जंक्शन

इलाके के पुरखे बने थे स्कंदगुप्त के सैनिक और कमांडर
1600 साल पहले की यह महान क्रांति गाथा है। औड़िहार के बिल्कुल बगल से बहने वाली मां गंगा की धारा में ही तब स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य के विक्रम ने नई लहर उठाई थी जिसमें हूणों का कहर सदा के लिए विलीन हुआ था। गंगा की लहरों पर जब पहली बार हूणों की बर्बरता की काली छाया पड़ी थी तब से लेकर आजतक कितना पानी बह गया किन्तु प्रयाग से पाटलीपुत्र के मध्य काशी और बलिया-ग तक के हजारों गांव और करोड़ों लोगों के मन से उस खौफनाक अध्याय की स्मृतियां आजतक मिट नहीं सकीं। यहां के गांवों के नाम हूणों की पराजय के नाम से बसे, औड़िहार, मुड़ियार, हौणहीं, तैतारपुर ऐसे दर्जनों गांव हैं, जहां बसे लोगों के पुरखों ने स्कन्दगुप्त की महासेना के सैनिक और कमांडर के रूप में इस महायुद्ध में हिस्सा लिया था। अब ये इलाका गाजीपुर जनपद का हिस्सा है।

स्कंदगुप्त ने सोच समझकर किया था इस जगह का महायुद्ध के लिये चुनाव
बनारस की भूमि से सटकर बहने वाली गोमती और गंगा के संगम के तीर्थ कैथी मारकण्डेय महादेव से बिल्कुल ही सटा हुआ। हूणों से निपटने के लिए इस जगह का चुनाव स्कन्दगुप्त ने सोच-समझकर किया था। मौर्य काल से ही भितरी का इलाका गंगा के इस पार पश्चिमी दिशा में पाटलीपुत्र की सुरक्षा के लिए अभेद्य रक्षा कवच था, यहां पर जो सैनिक छावनी कौटिल्य और चंद्रगुप्त मौर्य के समय निर्मित हुई वह गुप्त साम्राज्य के समय में भी सुगठित ढंग से संचालित होती रही थी। आज भी इस इलाके के युवाओं का डीएनए सबसे पहले भारत की सेना में ही करियर खोजता है, आंकड़े गवाही देते हैं कि भारत की फौजों में गाजीपुर के हर गांव से युवकों की टोलियां तब से ही भर्ती होती चली आ रही हैं, देश की रक्षा के लिए लहू बहा देने और अपना सब कुछ लुटा देने का यह पाठ उनके दिलो-दिमाग में स्कन्दगुप्त जैसे महानायकों की छाया में और प्रबलित हुआ था।

महाराज स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का सिक्का (फाइल फोटो)

हुण बन गये ‘हुणार’
हूणों से जो टक्कर तब हुई थी, आजतक उसकी स्मृति यहां के जन-जीवन के मन से मिटती नहीं। सैकड़ों साल से काली अंधेरी रातों में माताएं अनजाने ही सही इस भूभाग में बसे गांवों में अपने बच्चों को सुलाते समय यह कथा दोहराती आ रही हैं कि ‘बचवा सुत जा नाहीं त हूणार आ जाई।’ अर्थात, बेटा सो जा नहीं तो हूण आ जाएगा।

आपको शोले फिल्म में गब्बर सिंह का डायलॉग याद आ गया होगा, वह फिल्मी पटकथा का संवाद है लेकिन मैं जो बताने जा रहा हूं वह वास्तविक भारत-कथा है, जो हमारी लोक-स्मृतियों में भी अलग अलग संवाद रूप में अमर रूप से अंकित और अमिट है।

पहले बच्चों पर हमला करते थे हुण
डर और भय का सबब बने खूंखार हूणों के अत्याचार इस देश के लोक-मन पर इस कदर कहर बनकर बरपे कि पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बच्चों को सुलाते हुए माताएं हूणों के उस खौफनाक दौर को यादकर बरबस कलप उठती थीं, जब हूणों के भयानक हुजूम के हुजूम हिन्दुस्तान की धरती पर टूट पड़े थे, सबसे पहले बच्चों को निशाना बनाते थे, क्योंकि बच्चा अगर बच गया तो बड़ा होकर वह चुनौती बनेगा, बदला लेगा, युद्ध करेगा, इसलिए उसे सबसे पहले मार डालो। भावी पीढ़ी यानी बच्चों को मार डालना बर्बर हूणों की युद्ध नीति का सबसे अहम हिस्सा था। इसके बाद बची युवा पीढ़ी तो उसे रणभूमि में चाट डालो, काट डालो और उनकी स्त्रियों, जवान बेटियों को उठा ले जाओ। जले-लुटे-नष्ट-भ्रष्ट हुए गांवों में शेष बूढ़े बचे रहेंगे, जीवन-भर हूणों की भयानक करनी की कल्पना कर कर कलपते रहेंगे, छाती पीट पीटकर रोते रोते ही जिन्दगी बसर करेंगे, उस हदस के मारे ही मरने को विवश होंगे जो हादसा उनके जीवन में हूणों के हमले के खौफनाक मंजर से पैदा हुआ था।

बर्बर हुणों की सेना (प्रतीकात्मक चित्र)

आज भी लोगों के मन में है भय
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आज भी यह संवाद गांव-गांव प्रचलित है कि बचवा सुत जा, नाहीं त हुणार आ जाई। अब तक लोग इस प्रचलित शब्द हुणार को कोई जंगली जानवर मानते आए हैं जो बच्चों को उठा ले जाता है, जैसे कोई लकड़सुंघवा या कोई लकड़बघ्घा। लेकिन इतिहास की गुफाओं में प्रो. आरसी मजूमदार, जयशंकर प्रसाद और आचार्य वासुदेवशरण अग्रवाल जैसे कुछ यशस्वी लेखक-विद्वान जब पहुंचे तो पता चला पूर्वांचल के लोक-मन में यह जो हूणार शब्द है, यह किसी असल सियार, लकड़सुंघवा, लकड़बग्घे या किसी भेड़िये का नाम नहीं बल्कि भेड़िये के रूप में उन्हीं भयानक हूणों का मन के किसी कोने अंतरे में छिपा वह खौफ है जिसे भेड़िये की तरह पशुवत् हिंसक जीवन को अपनाकर ही हूणों ने विश्व इतिहास का सबसे बर्बर अध्याय लिखा और आज से 2000 साल पहले भारत की धरती पर भी अपनी तलवारों से मानवता के विरूद्ध अत्याचार और अपराध को सबसे भयावह रक्तरंजना दी थी।

विद्वानों द्वारा लिपिबद्ध किया गया सैदपुर भितरी में महाराज स्कंदगुप्त विक्रमादित्य के शिलालेख

स्कंदगुप्त की है ये महागाथा
किन्तु हूणों को तब शायद यह नहीं पता था कि जिस यूनान, मिस्र और रोम को वह मटियामेट कर अपनी अतृप्त लुटेरी पिपासा लिए भारत की बरबादी, लूट, हत्या, बलात्कार और डकैती का खौफ लिखने गंगा-यमुना की लहरों पर चढ़े चले आ रहे हैं, उसके जर्रे जर्रे में भारत की उठती जवानी उनकी ही मौत का इतिहास लिखेगी, इसीलिए स्कन्दगुप्त की महागाथा आज भी हमारे मन और दिलों में बार बार उठती है, न पहले कभी मिट सकी है और न ही भविष्य में कभी मिट सकेगी।

जब जब धर्म की हानि होगी… तब तब…
जब-जब धरती पर अत्याचार और बर्बरता का रौरव नरक बरसेगा तब-तब यह देश अमरता की अपनी उस महायात्रा को पुनर्जीवित करेगा जिसमें से स्कन्दगुप्त जैसे वीर नायक जन्म लेते हैं, इस देश के अमर संजीवन प्रवाह से शक्ति प्राप्त करते हैं और फिर अपना सब कुछ मातृभूमि की सेवा और सुरक्षा में लुटाकर चुपचाप धराधाम से विदा हो जाते हैं, जिनके कारण हमारा आपका अस्तित्व यूनान-रोम-मिस्र जैसी सभ्यताओं के मिट जाने के बाद भी संसार की छाती पर अपना ध्वज गाड़कर युग युग से जीवंत है, आज उसी महाप्रतापी वीर योद्धा महा सेनानी हुणारि विक्रमादित्य स्कन्द गुप्त की सत्य इतिहास गाथा आपको सुनाने जा रहा हूं मैं।

स्कंदगुप्त : भारत का रक्षक
स्कन्द गुप्त को महान इतिहासकार प्रो. आरसी मजुमदार ने ‘द सेवियर ऑफ इंडिया’ की उपाधि यूं ही नहीं दी है। सेवियर ऑफ इंडिया अर्थात भारत का रक्षक, भारत का त्राता, भारत को बचानेवाला। इतिहास में हूणों की दुर्दांत सेनाओं को अपने बाहुबल से स्कन्द गुप्त ने ही सबसे बड़ी टक्कर दी, इस हद तक टक्कर दी कि मध्य एशिया में हूणों के ठिकानों में विधवाएं ही विधवाएं बचीं और उन इलाकों में पुरूषों का मानो अकाल ही पड़ गया।

मारे गये थे तकरीबन दो लाख हुण
स्रोतों से जो जानकारी मिलती है उसके आकलन के अनुसार, कम से कम दो लाख हूणों की अश्वबल से सम्पन्न सेना में सबके मारे जाने की सूचना देने के लिए मुट्ठीभर ही बचे, जो सुरक्षित मध्य एशिया के अपने उन वीरान ठिकानों तक पहुंच सके, जहां से हूण जत्थे दनादन निकले थे। ये सोचकर कि भारत के सुन्दर बसे समृद्ध ऐश्वर्यशाली स्वावलंबी और प्रचुर धन-संपदा से सम्पन्न गांवों और आबाद लोगों को लूटकर वह सदा के लिए मालामाल हो जाएंगे, किन्तु वीर स्कन्दगुप्त और उसकी महासेना के पराक्रम के सामने हूणों का सारा अभियान ही धरा रह गया।

एक हुण सैनिक (प्रतीकात्मक चिह्न)

गंगा-गोमती के बीच फंसकर
आए तो थे गरजती-लपलपाती तलवारों को झनझनाते हुए, भारत के लोकजीवन को डराते-मारते-लूटते लेकिन स्कन्द गुप्त की कुशल व्यूह रचना के कारण गंगा-यमुना-गोमती आदि नदियों के प्रवाह में ऐसे फंसे कि भागने के लिए भी जगह नहीं बची। जिन कुछ हूण-टुकड़ियों को स्कन्दगुप्त ने क्षमादान दिया भी तो पश्चिम की ओर जाने वाले उत्तरापथ से जुड़े गणराज्यों यौध्देय, मालव, क्षुद्रक के वीरों ने मार-मारकर यमलोक पहुंचा डाला।

आसान नहीं था ये महासंग्राम
हूणों पर स्कन्दगुप्त की यह ऐतिहासिक विजय इतनी आसान नहीं थी जितनी कि हम आप कुछ पंक्तियों के जरिए इसे समझ पा रहे हैं। गुप्तचरों ने जब पहली बार हूणों की टक्कर से तबाह हुए पुरु और कुरु, गंधार आदि गणराज्यों का हाल तब के केंद्रीय साम्राज्य पाटलिपुत्र (पटना) पहुंचाना प्रारंभ किया तो लगभग 60 वर्ष की उम्र पारकर बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े सम्राट कुमार गुप्त की छाती भी धस्स कर गई।

गुप्त साम्राज्य : जब सोने की चिडिया था भारत
ईस्वी सन 413 के करीब सिंहासन पर बैठे सम्राट कुमार गुप्त महेंद्रादित्य ने चालीस वर्ष तक कुशलतापूर्वक भारत को केंद्रीय नेतृत्व प्रदान किया। जिनके अमर पुरखों के पराक्रम से सजी-धजी राजधानी पाटलीपुत्र के ऐश्वर्य की कहानियां सारे संसार को तब चकित और स्तंभित कर देती थी। परम भागवत महाराजाधिराज चक्रवर्ती सम्राट समुद्रगुप्त विक्रमादित्य और उनके अजेय बलशाली पुत्र परमभागवत महाराजाधिराज चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के द्वारा खड़े किए गए साम्राज्य की सेवा में कुमार गुप्त ने कोई कमी नहीं रख छोड़ी।

सैदपुर भितरी रेलवे स्टेशन

भारत की समृद्धि के आगे कहीं नहीं टिकता था यूरोप
यूनान और रोमन साम्राज्य या तबके रंक यूरोप के हिस्से तो भारत की समृद्धि के सम्मुख कहीं खड़े तक नहीं होते थे। राम-कृष्ण जैसे महान धुरंधरों को जन्म देने वाली जगत जननी मातृभूमि भारत की पताका तब पश्चिम में गांधार के पार यूनानी-ग्रीक राज्यों तक फहर रही थी। तो पूरब में आज का जो मलेशिया, इंडोनेशिया, बाली आदि अनेक द्वीपसमूह हैं, सबके सब भारत के चक्रवर्ती साम्राज्य के अभिन्न अंग थे। भारत में लोकतंत्र तब शिखर पर था। सैकड़ों जनपद और गणराज्य अपने केंद्रीय चक्रवती साम्राज्य की देख-रेख में प्रत्येक ग्राम और पुर तक स्वायत्त शासन और ग्रामीण स्वावलंबन की बेमिसाल गाथा लिख चुके थे।

इंसान ही नहीं पशु-पक्षी भी थे सुखी
मनुष्य मात्र को तो सुखी जीवन-समृद्ध जीवन की गारंटी थी ही, मानव संबंध अर्थात आज का जो HUMAN RELATION का कॉरपोरेट सिद्धांत है, वह पशुओं और जीवों तक के जीवन के लिए भी सुख की अमोघ गारंटी बन चुका था, जिसकी बुनियाद अहिंसा परमो धर्मः के परम सिद्धांत के द्वारा सम्राट अशोक ईसा पूर्व तीसरी सदी में ही रख चुके थे। हर जीव-जानवर और चौपाए के लिए तब भारत के कुशल शिल्पियों ने म्यूजिक सिस्टम विकसित किया था, बैलों के गले में घंटिया थीं, और घोड़े-गधे और सवारी ढोने वाले पशुओं के पैरों में भी घुंघरू थे।

पशुओं के लिये भी तैयार किये जाते थे संगीतयंत्र
घर-गांव-कृषि और मानवता के प्रति दुधारु गाय की सेवाओं को देखते हुए तब पशुओं की सूची से इसे बाहर निकालकर इस देश ने माता का रूप दे दिया था, अहिंसा-करुणा से भरी इस भूमि का जीवों के प्रति दया-भाव की सचमुच पराकाष्ठा का पुनीत पावन यह इतिहास। भारत ने मनुष्य-मनोविज्ञान तो छोड़िए, पशु-विज्ञान के शिखर तक को छू लिया था कि मानव समुदाय को स्वयं सुखी रहने के लिए अपने पालतू पशुओं के साथ किस तरह दयापूर्वक व्यवहार करना चाहिए ताकि उनका पूरा सदुपयोग हो सके। उस दौर में कोई पशु नहीं था जिसके लिए भारत ने संगीत संगत विकसित नहीं किया। आज भी बंदरों को मदारी डमरू सुनाते हैं, सांपों को सपेरे बीन की संगीत पर नचाते हैं, कोयल और पक्षियों के कलरव की नकल कर वैसा ही संगीत सुनाने वाले और उनकी आवाज सुनकर उनकी बातचीत तक का पता लगाने वाले विशेषज्ञ भारत के वन्य प्रदेशों में शिक्षित-प्रशिक्षित थे। हाथी और घोड़े ढोल-नगाड़े की आवाज सुनकर और मुख से लेकर पैरों तक सोने-चांदी के साथ अपने महावत के संकेत मात्र को समझकर सज-धजकर शान दिखाते यूं खड़े हो जाते थे मानो सारे संसार का ऐश्वर्य भारत के चरणों में आ गिरा हो।

स्कंदगुप्त ने आगे बढकर स्वीकार की थी चुनौती
वह भारत आज केवल हम कहानियों और किस्सों में ही देख पाते हैं, जिसे तब हमारे पुरखों ने अपने परिश्रम और प्रताप से इतना सुन्दर बनाया था कि संसार इसे सोने की चिड़िया कहता था तो कोई सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बता-बताकर दुनिया को भारत पर कब्जे के लिए उकसाता था। उसी भारत की बुनियाद पर जो गुप्त साम्राज्य खड़ा हुआ था, उसे संसार की सबसे बर्बर हूण सेनाओं से मुकाबले की जब चुनौती मिली तो वीरों की भुजाएं फड़क उठीं, तनी छाती प्रतिकार के लिए धड़क उठी, तलवारें रक्तपान को मचल गईं किन्तु देश के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा था कि रणभूमि में सेना की कमान संभालेगा कौन? देश के लिए मृत्यु बन खड़े इस विकराल संकट को ललकारेगा कौन? सम्राट कुमार गुप्त का स्वास्थ्य इस स्थिति में नहीं था कि वह स्वयं सेनाओं का नेतृत्व कर रणभूमि में हूणों को ललकारने उतर पड़ते। सबके मन में प्रश्न था तो स्वयं सम्राट नेतृत्व नहीं करेंगे तो कौन? राजपुत्रों में उत्तराधिकार तय नहीं था और प्रश्न यह भी कि हूणों के साथ सैन्य संघर्ष में जीवित बचकर लौट आने की गारंटी नहीं। तब कांपती भुजाओं वाले उस पिता कुमार गुप्त के सबसे युवा पुत्र स्कन्दगुप्त ने स्वयं ही आगे बढ़कर पिता का धर्म संकट दूर करते हुए भरे दरबार में सिंह गर्जना के साथ हूणों के मुंडों की माला से भारत जननी के श्रृंगार का संकल्प लिया।

(क्रमशः)

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