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लेखक अभि‍षेक त्रि‍पाठी वरि‍ष्‍ठ पत्रकार हैं


सन 1780 के बाद का कोई साल रहा होगा, अवध (लखनऊ) में भयानक अकाल पड़ा। पशु-पक्षियों से लेकर इंसान तक हाहाकार कर उठे। नदियों-नहरों में पानी नहीं, कुएं सूख गए-बावड़ियों में धूल उड़ने लगी। खेत-खलिहान सब बरबाद हो गए, फसल के नाम पर खर-पतवार ने भी उगने से इनकार सा कर दिया था…

गरीब को यूं तो पेट काटने की आदत थी, सो वो पेट काटकर जीता रहा। रईस अपनी जमापूंजी खाते रहे बिल्कुल आज के लॉकडाउन की तरह। फिर एक वक्त आया जब रईसों के भंडार भी चुक गए, हर तरफ त्राहि-त्राहि होने लगी। लोग मरने लगे, जो जिंदा थे वो कामकाज के अभाव में दिमागी रूप से विचलित होने लगे।

शासन के गुप्त विरोधी ऐसे समय सक्रिय हो जाते हैं, सो जगह-जगह लूटपाट के मामले आने लगे, घर में रखा राशन तक महफूज नहीं रहा, दंगे होने लगे मजहब के नाम पर। माहौल में अजीब सी उदासी छाती जा रही थी। ऐशोआराम का शहर मरघटी सन्नाटे से परेशान हो उठा था…

अवध के तत्कालीन नवाब आसफ़ुद्दौला यह सब देख रहे थे और अपनी अवाम की लाचारी भी महसूस कर रहे थे। एक रात आसफ़ुद्दौला के मन मे एक ख्याल आया। उन्होंने तत्काल वजीरों को बुलावा भेजा। दरबार सजा, सभी कयास लगा रहे थे कि इतनी रात में नवाब को कौन सी सनक सवार हुई! अपने अजब फैसलों के लिए अवध के नवाब पीढ़ियों से कुख्यात जो थे… नवाब से मुख्य खजांची से खजाने के बारे में पूछा तो पता चला कि खजाने में संपदा कम ही बची है।

नवाब ने आदेश दिया कि कल सुबह से लखनऊ में इमामबाड़ा की तामीर शुरू कराई जाएगी। यह भी कहा कि इसे आम जनता मिलकर बनाएगी। जो भी स्वेच्छया श्रमदान करना चाहें, आ सकते हैं। उन्हें उनका मेहनताना और खाना दोनों दिया जाएगा। खजांची ने सिर पीट लिया। वजीरों के चेहरे टेढ़े हो गए, वो मन ही मन सोचने लगे कि खजाना कम बचा है, जीडीपी गिरती जा रही है, यूएन ने मंदी का प्रेडिक्शन किया है और ये सिरफिरा अब इमामबाड़ा बनवायेगा, लग रहा है हमारी तनख्वाह भी लटकायेगा!!! हालांकि नवाब की बात काटकर कौन हाथी के पांव के नीचे सिर देता, लिहाजा दांत पीसते हुए सभी ने ‘मरहबा-मरहबा’ किया। अगली सुबह पूरे राज्य में डुगडुगी पिटवा दी गई।

अवाम खाली बैठी थी। मेहनताना और खाना के नाम पहले दिन 10, अगले दिन 50, फिर सौ, फिर पांच सौ और ऐसे करके हजारों लोग काम करने आने लगे। खानसामों की पूरी फौज अलग-अलग प्रकार का खाना पकाने लगे। लोग काम करते फिर खाना खाते, फिर काम करने लगते। रईसों का पास भी धन खत्म हो चुका था, उनके लिए भी एक व्यवस्था बनाई गई। दिन के वक्त साधारण लोग काम करते थे और रात में रईस, ताकि उन्हें भी भूखे न सोना पड़े।

एक वक्त ऐसा भी आया कि कामगारों की अधिक संख्या होने के कारण इमामबाड़ा उम्मीद से पहले ही बनकर तैयार होता दिखा। वजीरों ने ये बात नवाब को बताई तो उसके माथे पर चिंता की लकीरें खिंच आईं, फिर उसने एक रास्ता निकाला तो वजीरों ने फिर माथा पीट लिया। नवाब ने कहा कि दिनभर में तामीर की गई इमारत रात में गिरवा दी जाए, ताकि लोग फिलहाल लम्बे समय तक काम कर सकें…

लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा

बहरहाल, एक दिन इमामबाड़ा बनकर तैयार हो गया। तब तक अकाल भी खत्म हो चला था। नदी-नहरों, कुओं-बावड़ियों में पानी आ गया। लोगबाग घरों को लौटने लगे, फसल उगाने लगे, जीडीपी संभालने लगे।

खूबसूरत इमामबाड़े के नीचे खड़े नवाब आसफ़ुद्दौला से किसी ने पूछा, जनाब लॉकडाउन में ये क्या फितूर था! मंदी के दौर में इतनी रकम खर्च कर सबको खाना और मेहनताना देना? नवाब ने जवाब दिया- मंदी के उस दौर में हर कोई खाली था, और हालात से परेशान। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। इसलिए लूटपाट-दंगे और चोरियां बढ़ने लगी थीं। लोग वो सबकुछ करने को तैयार थे जो आम दिनों में उनके लिए नीच और घृणित कर्म था… ऐसे में उन्हें व्यस्त रखना जरूरी था।

यहीं से एक कहावत चल निकली थी, ‘जिसको ना दे मौला, उसको दे आसफ़ुद्दौला’।

बहरहाल नवाब के इस फैसले ने इस कहावत के अलावा भी तब के अवध और आज के लखनऊ को काफी कुछ दिया। उसने दिया इमामबाड़ा, बिरयानी, नहारी और खाना पकाने की वो विधा जिसे ‘दमपुख्त’ कहते हैं।

उस फैसले ने कुछ और भी दिया… उसने बताया कि इन्सान जानवर नहीं है कि उसे खाना छीनना या चुराना पड़े। वो बेवकूफ नहीं है कि किसी के बहकावे में आकर अपने सामाजिक ढांचे को बिगाड़े, आसपड़ोस के लोगों की जान ले। उसे चाहिए बस सही फैसले लेने वाला नेतृत्व जो कठिन परिस्थितियों में भी उसे सही राह दिखा सके। ताली-थाली बजा कर या दिए जलाकर ही सही, उसे अपने सामाजिक तानेबाने का, अपनी नैतिक जिम्मेदारी का एहसास करा सके…

लॉकडाउन के फैसले से झुंझलाए जा रहे हैं तो नीचे का ग्राफ देख लीजिए। दिया-बाती, योगा और रस्सी कूदने की जरूरत क्यों है, इसको समझ लीजिए।

क्या आपको भी ऊपर की कहानी और आज के हालात में कुछ समानता नजर आती है?? अगर हां तो बताइएगा जरूर…

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