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बनारस की रंगभरी एकादशी!!

क्योकि बनारस सात वार और नौ त्यौहार वाला शहर है और जब बात काशी विश्वनाथ से जुडी हो तो फिर खुशी, उंमग, उल्लास कई गुना बढ़ जाता है।

रंगभरी एकादशी बनारस के मुख्य उत्सवों में से एक है और इसकी शानों शौकत, नजाकत, ठाठ देखना हो तो आपको एक बार इस दिन काशी विश्वनाथ का रुख जरूर करना चाहिए।

काशी पुराधिपति ( श्री काशी विश्वनाथ ) के गौने का बरात
जी हां ! बनारस वाले इसे यही जानते हैं और जहाँ शिव की बात हो वहा श्रद्धा और विश्वास की कोई कमी नहीं।

बसंतपंचमी पर शिव के तिलकोत्सव, शिवरात्रि पर वि‍वाह तो रंगभरी एकादशी भोलेनाथ के गौने के लिए जाना जाता है और ये उत्सव बनारस में पुरे जोश से से मनाया जाता है। रंगभरी एकादशी पर भोले बाबा दूल्हा बनते है। तन पर भस्मभभूत की जगह गोटा जड़े खादी सिल्क के वस्त्र, लाल सुर्ख पगड़ी और धोती के साथ सुनहरी चाँदीदार अगरपंखा व सुनहरी लाल किनारों पर सिल्वर कढ़ाई वाला दुपट्टा भी खूब फबता है। गले में सर्प, हाथ में डमरू और त्रिशूल, भाल चन्द्र और सिर गंगा लहरे तो हाथ में भांग का एक झोला।

तो उधर दुल्हनिया रानी गौरा भी भोलेनाथ के लिए 16 शृंगार किये हैं। जरी की लाल और सिल्वर किनारों वाली खाटी बनारसी साड़ी, गौरा की आँखो में पारने के लिए काजल श्रीकाशी विश्वनाथ के खप्पर से मंगाई गई। पार्वती मंदिर के कटोर दान से मंगाई गई लाली से बहुरिया के रक्तिम अधरों का रंग और गहरा जाता है। और सुहाता है। बेला के गजरे से गौरा के केशों का शृंगार खूबसूरती में चार चाँद लगा देता है। पैरों में लाल महावर, हाथों में लाल मेहँदी रची शिव के प्रेम में मेहँदी का रंग और चटक और खिला हुआ।

अब सारे गौने के बाराती (बनारसवासी) तैयार। इनका भी ठाठ बाबा से कुछ कम नहीं होता ( अरे त लइका भी तो इनके ही है ना)। गले में रुद्राक्ष की माला, सिर पर सफ़ेद पगडी, सफेद धोती कुर्ता और हांथो में डमरू ये है गौने के बाराती।

अब भोलेबाबा माता गौरा को उनके पीहर (मायके) से लेकर अपने घर (काशी विश्वनाथ मंदिर) की ओर निकलते हैं। गौरा और शिव की आगवानी रेडकार्पेट पर होती है।

रजत पालकी पर शिवगौरा और गणेश, पालकी उठाये शिवपुत्र, मार्ग में डमरू, शंख, घण्टघड़ियाल लिए सैकड़ो भक्त उन्हें एक साथ बजाते है। मार्ग में गलियों के ऊपर मकानों से शिव गौरा के आने की खुशी में अबीरगुलाल और पुष्प वर्षा होती है।

पूरी गलियाँ, पूरा काशी विश्वनाथ मंदिर सैकड़ों क्विंटल लाल, पीले, हरे रंगो की सुगन्धित अमीर गुलाल से पट जाता है। हर एक चेहरा, हर एक वस्त्र, हर एक रंग लाल ही लाल नजर आता है। और सैकड़ो डमरू की डम डम, कई क्विन्टल अबीर गुलाल के बीच माता गौरा एवं भगवान शिव श्री काशी विश्वनाथ धाम पहुँचते हैं। यानि माता गौरा आपने ससुराल मेंऔर बस इसी गौने के साथ ही भगवान शिव अपने पुत्रों को होली खेलने की आधिकारिक अनुमति देते हैंऔर डूब जाता है सारा शहर रंगो में, भांग में, मस्ती में, रिश्ते में। मस्ती का शहर और भी मस्त हो जाता है।


ये पोस्‍ट सोशल मीडि‍या से साभार ली जा रही है। लेखक का नाम नहीं पता। इस पोस्‍ट के वास्‍तवि‍क लेखक को धन्‍यवाद के साथ।

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