ALAMGIRI MASJID VARANASI
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विशेष संवाददाता : सनी कुमार 

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वाराणसी। धर्म की नगरी काशी यूं ही अनोखी नहीं है। शिव की इस नगरी में तमाम ऐसी इमारतें हैं जो अपने आप में कई इतिहास समेटे हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि हम इन ऐतिहासिक इमारतों के साक्षी हैं। वाराणसी की ऐतिहासिक इमारतों के क्रम में आज हम पंचगंगा घाट स्थित आलमगीर के धौरहरा मस्जिद माधवराव के बारे में कुछ तथ्यों को जानेंगे।

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पंचगंगा घाट स्थित आलमगीर मस्जिद अपने आप में कई इतिहास समेटे है। मस्जिद के ठीक सामने बिंदु माधव प्रभु का मंदिर भी है। हम कह सकते हैं ये हमारी गंगा-जमुनी तहजीब की निशानी है, जहां हर शुक्रवार जुमे के नमाज के लिए मुस्लिम बंधु भी आते हैं और एक तरफ बिंदु माधव के दर्शन के लिए हिंदू भाई भी पहुंचते हैं। मस्जिद के बनने की तिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन ये तो तय है कि इसका निर्माण औरंगजेब ने करवाया था। इस मस्जिद का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। इसके विशाल प्रांगण मे बना फव्वारा इसके इतिहास की कहानी कहता है।

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मस्जिद के 174.2 फुट दो मिनारों में से एक जर्जर होकर गिरी तो दूसरे को सुरक्षा कारणों के कारण गिरा दिया गया। कहा तो ये भी जाता है कि इन मिनारों से दिल्ली के लाल किले की रोशनी दिखाई देती थी।

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मस्जिद की देख-रेख में वहां पर रह रहे मुन्ना भाई और जमाल भाई ने बताया कि जब इस ऐतिहासिक धरोहर की सबसे बड़ी दो मिनारों में से एक जर्जर होकर गिरा था तब बाढ़ का वक्त था, जिससे किसी को कोई नुकसान या बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। इसके बाद सरकार ने लोगों की सुरक्षा को देखते हुए दूसरे मिनार को भी निकलवा दिया।

मस्जिद में एक छोटे सी गेट है जो ऊपर मिनारों तक जाने का रास्ता है। इसकी 40 खड़ी सिढ़ियां भी 17वीं शताब्दी के कलाकृतियों का नायाब नमूना जिसे चढ़कर मिनार तक पहुंचा जा सकता है। छत से देखने पर पूरा मुहल्ला आपको खिलौनो के रुप में दिखेगा और बात करे घाट के नजारे की तो इसे देखना बेहद सुखद अनुभव जैसा है।

हर हफ्ते इसकी सफाई और धुलाई की जाती है ताकि इसकी चमक व आकर्षण में कोई कमी ना आ सके और वाराणसी आने वाले पर्यटक इस नायाब ऐतिहासिक धरोहर को देख और जान सके। मस्जिद के विशाल प्रांगण के बीच बना चौकोर फव्वारे व तालाब में गोल्डेन फिश, कछुए छोड़े गए हैं।

मस्जिद के निर्माण को लेकर बहुत सी कहानियां प्रचलित हैं। प्रसिद्ध विद्वान डॉ रघुनाथ सिंह ने इस मस्जिद के निर्माण को लेकर एक अलग कहानी बतायी है। उनके अनुसार घाट के किनारे एक ब्राह्मण परिवार रहता था। इस परिवार की विधवा कन्या पर शहर का कोतवाल मोहित हो गया। वह विधवा कन्या से विवाह के लिए दबाव बनाने लगा।

तब ब्राह्मण ने कोतवाल के खिलाफ औरंगजेब से मदद की गुहार लगाई। उसकी गुहार पर औरंगजेब वाराणसी आया और उसने कोतवाल को मारकर उस ब्राह्मण की कन्या की लाज रख ली थी। इसके बाद औरंगजेब ने वहां पर शाम की नमाज अदा की थी। जाते समय उसने यहां पर एक मस्जिद बनाने का आदेश दिया, जिसके बाद इस विशाल मस्जिद का निर्माण हुआ।

मस्जिद की कलाकृति मुगल काल का बेहतरीन व आकर्षक नमूना है। गुबंद से लेकर दीवारों पर की गयी कारिगरी इसके कला का बखान करती है। यह इमारत अब आर्कि‍योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अधीन है, सरकार इसके सुंदरीकरण और मजबूती के लिए कार्य कर रही है। रात के अंधेरे में लाईटों की रौशनी में इसे देखना एक अलग ही अनुभव को महसूस करने जैसा है। मस्जिद से घाट का नजारा देखना अत्यंत सुखद और मोहक है।

अगर आप पुराने इतिहासों के जानने के शौकीन हैं तो आपको भी इस मस्‍जि‍द में आकर इसे देखना और जानना चाहिए, जो अपने आप में ढेर सारे राज़ समेटे हुए है।

देखिये तस्वीरें 

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