प्रधानमंत्री की कर्म भूमि पर बापू का स्मारक, शताब्दी वर्ष में दिन बहुरने का इंतज़ार

सत्य और अहिंसा के हथियार के दम पर जिस महात्मा गांधी ने भारत को आज़ादी दिलाई उनकी कुर्बानियों को अब शायद हम धीरे धीरे भूल रहे है। जहां पूरा विश्व महात्मा गांधी की स्मृतियों को सहेजने में लगा है। वही भारत के प्रधानमन्त्री की कर्म भूमि में महात्मा गांधी की एक मात्र स्मृति अवशेष “गांधी चौरा” पर संकट के बादल छाए हुए है।

वाराणसी। कहतें हैं काशी में जिसे मृत्यु आती है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और यदि काशी में मृत्यु न हो तो उसकी अस्थियां काशी लाकर गंगा में विसर्जित करने पर उसे मोक्ष मिलता है। यह धारणा पुरखों से चली आ रही है इसी धारणा को आत्मसात किये भारत के लोगों ने जब साल 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या हुई तो राजघाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने के बाद उनकी अस्थियां काशी में लाकर प्रवाहित की गयी। काशी में अस्थियां प्रवाहित होने से पहले शहर के बीचों बीच स्थित बेनियाबाग मैदान में जनता के दर्शनार्थ रखी गयी थी। काशी का वही ऐतिहासिक स्थल आज खुद पर आंसू बहा रहा है। पेश है स्पेशल रिपोर्ट…

काशी आयी थी राष्ट्रपिता की अस्थियां
काशी महापुरुषों की धरती है और यहां से कई ऐसे भारत मां के सपूतों ने आज़ादी की लड़ाइयों में भाग लिया है जिसका ऋणी आज पूरा भारतवर्ष है। वही काशी मोक्ष की नगरी है और कहा जाता है कि यहां के दर्शन मात्र से स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त होता है। ऐसे में जब देश के राष्ट्रपिता भारतीय आज़ादी के नायक मोहन दास करमचंद गांधी की जब हत्या हुई तो पूरा देश हिल गया। उनकी अस्थि को काशी लाया गया गंगा में विसर्जित करने के लिए पर समस्या यह थी की देश के राष्ट्रपिता की अस्थियां कहां रक्खी जाएं।

बेनियाबाग में मिला था समस्या का समाधान
22 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की अस्थियां जब काशी पहुंची तो उसे शहर के बीचों बीच स्थित बेनियाबाग मैदान में रात 8 बजे दर्शनार्थ रखा गया और उसके अगले दिन सुबह 8 बजे रघुनाथ सिंह राजकीय और सैनिक सम्मान के साथ हरिश्चंद्र शमशान घाट ले गए और मोक्षदायनीय गंगा की अविरल धारा में प्रवाहित किया। उसके बाद साल बीता और स्वाधीन भारत के प्रथम गवर्नर राजगोपालाचारी ने 1 दिसंम्बर 1949 को शाम 4 बजे बेनियाबाग मैदान के उसी स्थान पर गांधी चौरे का शिलान्यास किया।

गांधी चौरे पर सजती है नशे की महफ़िल
वक़्त बदले, हालात बदले और साथ ही साथ सरकारें भी बदली। कल हम सभी राष्ट्रपिता की जयंती का 150 वर्ष ( शताब्दी वर्ष) समारोह मनाएंगे। सभी सरकारी प्रतिष्ठानों पर झंडारोहण होगा पर शहर का यह स्थल जिसे शायद आज भी गांधी जी जुड़े हुए हैं वह जर्जर हो चुका है। इसके आस पास बरसात के बाद पानी बजबजा रहा है। स्थानीय लोगों की माने तो रात में यह गांधी चौरा नशेड़ियों का अड्डा बना रहता है।

नहीं देता प्रशासन ध्यान
सत्य अहिंसा और मदिरापान को निषेध बताने वाले बापू की इस स्मृति पर न सरकार का ध्यान है और नहीं स्थानीय प्रशासन का, इस मैदान के प्रशासक कमिश्नर और जिलाधिकारी होते हैं। उसके बावजूद इस ऐतिहासिक स्थल का यह स्वरुप खुद के अंदर झाँकने के लिए काफी है। ये बातें कहते हुए क्षेत्र के बुज़ुर्ग हाजी आफताब खामोश हो गए।

बिखरने की कगार पर है गांधी चौरा
हाजी आफताब ने बताया कि मुस्लिम घनी आबादी के बीचों बीच बना यह चौरा भारतीय इतिहास का न मिटने वाला हिस्सा है पर शासन और प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो हमारी आने वाले पीढ़ी इसे खंडहर बताएगी और उसे नहीं पता होगा की यहां क्या हुआ होगा। उन्होंने बताया कि शुरुआत में कुछ कांग्रेसी और इलाकाई लोग जो गांधीवादी थे वो यहाँ आकर देश और दुनिया की बातें और सत्य और अहिंसा का अलख जगाते थे, पर वक़्त गुज़रा और लोग समय की रफ्तार के सतह आगे निकल गए और यह चौरा अपनी बदहाली को समेत नहीं पाया और आज बिखरने की कगार पर है।

कल सभी महात्मा गांधी का शताब्दी वर्ष मनाएंगे और जगह-जगह कार्यक्रम भी होंगे अब देखना यह होगा कि क्या जिलाधिकारी, कमिश्नर या कोई अन्य इस स्मारक पर आकर गांधी जी को याद करेगा या नहीं।

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