‘अभहीं ना डुबिहें हे दीनानाथ, करिहे घरवा उजि‍यार… करि‍हें क्षमा छठि मइया, भूल-चूक गलती हमार’

वाराणसी। भगवान भास्कर की बहन छठी मईया का पर्व ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर आज शुरू हो गया। व्रती महिलाओं ने कल से ही छठ के लिए निर्जला व्रत शुरू कर दिया था। कोई दंडवत तो कोई नंगे पैर माता छठी को अर्घ्य देने के लिए वाराणसी के गंगा घाटों, सरोवरों और तालाबों पर पहुंचा था। शहर के उस पार वरुणा तट पर भी व्रती महिलाओं ने ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया।

भगवान सूर्य जिन्हें आदित्य भी कहा जाता है, जो वास्तव में एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी रोशनी से ही प्रकृति में जीवन चक्र चलता है। इनकी किरणों से ही धरती में प्राण का संचार होता है। कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष के षष्ठी के दिन अस्त होते हुवे सूर्य को अर्घ्य देने के बाद अब अगले दिन अर्घ्य देने के लिए गंगा की गोद में इंतज़ार करती इन महिलाओं की यही कामना है की अगले दिन सूर्य जब निकलेंगे तो एक नए तेज के साथ आयेंगे, जिसकी रौशनी इनके घर को खुशियों से भर देगी।

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इस पर्व में जल और सूर्य की महत्ता है, जिसके बिना जीवन की कल्पना नही की जा सकती।

सूर्य षष्टी या छठ व्रत सूर्य भगवान को समर्पित है। इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी होती है।

काशी के पावन घाटों पर इस पर्व पर श्रद्धालुओं का जन सैलाब उमड़ पड़ा हैं। सबके मन में यही श्रद्धा यही होती है की भगवान भास्कर और छठी मैया मन की मुरादे पूरी करेंगी।

छठ पर वाराणसी के घाटों पर आस्था का जन सैलाब उमड़ पडा। गंगा की गोद में खड़े हो कर लाखों हाथों ने डूबते हुवे सूर्य को इस कामना के साथ विदा कर रहे थे की कल एक नए तेज के साथ आयेंगे और अपनी रौशनी से उनके घर को खुशियों से भर देंगे इस पूजा में पानी और सूर्य का महत्व है रंग बिरंगे वस्त्रों में सजी संवरी सभी महिलायें आस्था के उस रंग में रंगी हैं जिसकी छटा छठी मैया के गीत से और भी अलौकिक हो उठता है!

उगते सूरज को तो सभी सलाम करते हैं लेकिन इसे छठी मैया की कृपा ही कहें की यहाँ डूबते हुए सूरज को भी अर्घ्य देकर उसका अभिनन्दन किया जाता है। ये ना सिर्फ आस्था और विश्वास बल्कि समभाव की भावना भी दिखाता है और साथ ही ये कामना भी “अभी ना डुबिहे भास्कर दीनानाथ करिहे घरवा उजार हो।”

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