रामनगर में श्यामवर्ण हनुमान जी का दर्शन करने के लिए उमड़े भक्त, साल में एक दिन खुलता है कपाट

रामनगर किले में स्थापित श्यामवर्ण हनुमान जी की वायरल तस्वीर

वाराणसी। काशीराज घराना के रामनगर दुर्ग में विराजमान दक्षिणमुखी श्यामवर्ण हनुमानजी के मंदिर का कपाट शनिवार को आम जनता के दर्शन के लिए खोल दिया गया। पूरे वर्ष में सिर्फ एक दिन के लिये आम जनमानस के लिये खुलने वाले मंदिर में सुबह से ही भक्‍तों का तांता लगा हुआ है। शनिवार का दिन होने के कारण आज यहां आस्‍थावानों की भीड़ हर वर्ष से ज्‍यादा देखने को मिली।

भोर में राजा रामचंद्र की ऐतिहासिक आरती के बाद सुबह छह बजे से ही दुर्ग के बाहर लीला प्रेमियों सहित भारी संख्या में महिलाओं की भीड़ दक्षिणमुखी श्‍यामवर्ण हनुमानजी के दर्शन के लिये उमड़ पड़ी। भीड़ को देखते हुए रामनगर थाने की पुलिस फोर्स संग किले के सुरक्षाकर्मी व दर्जनों की संख्‍या में महिला कांस्टेबल व्‍यवस्‍था को संभालने में जुटे हुए हैं।

सुबह से ही लोगों की लगी कतार के बीच आरती के उपरांत दिन में 10 बजे मंदिर को आम जनमानस के लिये खोल दिया गया। मंदिर में दर्शन को लेकर लोगों की बेसब्री का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दक्षिणमुखी श्‍यामवर्ण हनुमानजी का दर्शन करने के लिए दुर्ग के बाहर तकरीबन तीन सौ मीटर तक लाइन देखने को मिली।

रामनगर किले में स्थापित श्यामवर्ण हनुमान जी की वायरल तस्वीर

अक्‍टूबर माह में भी तीखी धूप बिखेर रहे भगवान भास्‍कर के कोप को सहते हुए लोग लाइन में डटे दिखे। इस दौरान दस-दस की संख्या में लोगों को दक्षिणमुखी श्‍यामवर्ण हनुमानजी का दर्शन कराया गया। किले के बाहर भारी भीड़ जमा होने के कारण रामनगर की यातायात व्यवस्था भी कई बार चरमराती दिखी।

इसलिये खास हैं श्‍यामवर्ण हनुमान जी
लोकमान्‍यताओं की बात करें तो रामनगर किले के दक्षिणी छोर पर विराजमान श्‍यामवर्ण दक्षिणमुखी हनुमान जी की प्रतिमा पूरे विश्‍व में अनूठी है। किले के भीतर खुदाई के दौरान मिली इस प्रतिमा को सैकड़ों साल पहले काशीराज परिवार ने किले में के ही दक्षिणी छोर में मंदिर निर्माण कराके प्रतिष्‍ठापित कराया था।

मान्‍यता है कि इस प्रतिमा का संबंध त्रेतायुग में श्रीराम रावण युद्धकाल से है। तब रामेश्‍वरम् में लंका जाने के लिये जब भगवान राम समुद्र से रास्‍ता मांग रहे थे उस समय समुद्र ने पहले तो उन्‍हें रास्‍ता नहीं दिया। इसपर कुपित होकर श्रीराम ने बाण से समुद्र को सुखा देने की चेतावनी दी। इसपर भयभीत होकर प्रगट हुए समुद्र द्वारा श्रीराम से माफी मांगी गयी और अनुनय-विनय किया गया।

इसके बाद श्रीराम ने प्रत्‍यंचा पर चढ़ चुके उस बाण को पश्‍चिम दिशा की ओर छोड़ दिया। इसी समय बाण के तेज से धरती वासियों पर कोई आफत ना आये इसके लिये हनुमानजी घुटने के बल बैठ गये, जिससे धरती को डोलने से रोका जा सके। वहीं श्रीराम के बाण के तेज के कारण हनुमानजी का पूरा देह झुलस गया, जिसके कारण उनका रंग काला पड़ गया।

ये मूर्ति रामनगर किले में जमीन के अंदर कैसे आयी, ये किसी को भी ज्ञात नहीं है। बाद में जब रामनगर की रामलीला शुरू हुई तो भोर की आरती के दिन (सिर्फ एक दिन) श्‍यामवर्ण हनुमानजी के मंदिर को आमजनमानस के लिये खोला जाने लगा। ये परंपरा सैकड़ों साल बाद आज भी बदस्‍तूर जारी है।

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