1008लीटर दूध से हुआ बाबा काशी वि‍श्‍वनाथ का दुग्धाभिषेक, रूद्र भूमि पूजन यज्ञ संपन्‍न

विज्ञापन

वाराणसी। सर्व लोक अखंड परिपूर्णानंद महा माता जी की पूजा के तहत रविवार को सुबह ब्रहम मुहूर्त में मंगला आरती के बाद बाबा विश्वनाथ को 1008 लीटर दूध से दुग्धाभि‍षेक किया गया। दशाश्वमेध, अस्सी घाट व नगवा आदि क्षेत्रों में टोली बनाकर गरीबों व जरूरतमंदों को वस्त्रदान एवं अन्नदान भी किया गया।

इस दौरान स्वामीश्री ने बताया कि अन्नदान, वस्त्रदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान, ये सारे दान इंसान को पुण्य का भागी बनाते हैं। किसी भी वस्तु का दान करने से मन को सांसारिक आसक्ति यानी मोह से छुटकारा मिलता है। हर तरह के लगाव और भाव को छोड़ने की शुरुआत दान और क्षमा से ही होती है। दान एक ऐसा कार्य है, जिसके जरिए हम न केवल धर्म का ठीक-ठीक पालन कर पाते हैं बल्कि अपने जीवन की तमाम समस्याओं से भी निकल सकते हैं। आयु, रक्षा और सेहत के लिए तो दान को अचूक माना जाता है। जीवन की तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए भी दान का विशेष महत्व है। दान करने से ग्रहों की पीड़ा से भी मुक्ति पाना आसान हो जाता है।

उन्होंने बताया कि जीवन की 5 मुख्य भक्तियों क्रमश: मातृ भक्ति, पितृ भक्ति, गुरू भक्ति, देव भक्ति तथा देश भक्ति प्रमुख है। बताया कि प्रत्येक मनुष्य तेजोमय, सत्यवदी धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय तथा मोक्षाकांक्षी बन अपना जीवन यापन करें।

स्वामीश्री ने रूद्र यज्ञ के लाभ के बारे में बताते हुए कहा कि वेद शिव, शिव वेद: वेद शिव है और शिव वेद है अर्थात शिव वेद स्वरूप है। यह भी कहा जाता है कि वेद नारायण का साक्षात स्वरूप है। उन्होंने कहा कि वेदो नारायण साक्षात स्वयम्भूरिति शुश्रुम है।

इसके साथ ही वेद को परमात्म प्रभु का नि:श्वास कहा गया है। इसलिए भारतीय संस्कृति में वेद की अनुपम महिमा है। स्वामी जी ने कहा कि जैसे ईश्वर अनादि अपौरूषेय हैं, उसी प्रकार वेद भी सनातन जगत में अनादि एवं अपौरूषेय माने जाते है। इसलिए वेद मंत्रों के द्वारा शिवजी का पूजन अभिषेक यज्ञ और तप आदि किया जाता है। शिव और रूद्र ब्रहम के ही पर्यायवाची शब्द है। शिव को रूद्र इसलिए कहा जाता है कि ये रूत अर्थात दुख को विनष्ट कर देते है।

स्वामीश्री ने बताया कि मनुष्य का मन विषय लोलुप होकर अधोगति को प्राप्त न हो और व्यक्ति चित्तवृत्तियों को स्वच्छ रख सके, इसके निमित्त रूद्र का अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ठ साधन है। यह रूद्रानुष्ठान प्रवृत्ति मार्ग से निवृत्त मार्ग प्राप्त कराने में समर्थ है। इस दौरान कोटेश्वनंद, राम जयराम व भक्तगण मौजूद रहे।

Loading...