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वाराणसी। आदिशक्ति का आठवां रूप यानी मां महागौरी के दर्शन का विधान नवरात्रि के आठवें दिन है। काशी में श्रीकाशी विश्‍वनाथ मंदिर परिक्षेत्र स्थित मां अन्‍नपूर्णा को महागौरी स्‍वरूप में पूजा जाता है। मां महागौरी का साधक अक्षण पुण्‍य का भागी होता है। मां की कृपा से अखंड सौभाग्‍य के साथ ही धन-धान्‍य की कमी नहीं होती और दुख-दारिद्रय पास भी नहीं फटकते।

इस तरह बनी थीं मां गौरा
लोकश्रुतियों के मुताबिक माता पार्वती ने भगवान शिव को पति स्‍वरूप पाने के लिए वर्षों का कठिन तप किया था। भोलेनाथ प्रसन्‍न हुए और माता को उनका अभीष्‍ट प्रदान किया। मगर लंबी तपस्‍या के कारण माता का रंग सांवला हो गया था। भोलेनाथ के कहने पर माता ने गंगाजल से स्‍नान किया और उनका रंग धवल हो गया। तभी से उन्‍हें मां गौरा या महागौरी कहा जाता है।

बाबा विश्‍वनाथ के समीप दरबार
बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर से चंद कदम दूरी पर मां अन्नपूर्णा का दरबार है जहां आज के दिन माँ का दर्शन को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। महागौरी की उपासना से भक्त के जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और मार्ग से भटका हुआ जातक भी सन्मार्ग पर आ जाता है। देवी महागौरी का यह शक्ति रूप भक्तों को तुरंत एवं अमोघ फल देता है। भविष्य में पाप-संताप, निर्धनता, दीनता और दुख उसके पास नहीं भटकते। देवी की कृपा से साधक सभी प्रकार से पवित्र एवं अक्षय पुण्य का अधिकारी हो जाता है।

सिंह और बैल हैं मां के वाहन
मां सिंह और बैल की सवारी करती हैं। इसकी भी कथा है। मान्‍यताओं के अनुसर मां जब तप कर रही थीं तो एक भूखा सिंह उनके पास ही आकर बैठ गया। तप पूरा हुआ तो सिंह वहीं बैठा मिला और वह बेहद कमजोर हो चुका था। मां ने कहा कि उनके साथ सिंह ने भी तप किया है और उन्‍होंने उसे अपना वाहन बना लिया। महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

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