किसानों ने निभायी हजारों साल पुरानी परंपरा, धान की बालियों से सजाया मां अन्‍नपूर्णा का दरबार

विज्ञापन

वाराणसी। काशी की अधिष्‍ठात्री देवी मां अन्नपूर्णा के दरबार में सोमवार की सुबह से ही मइया के जयकारा लग रहे हैं। दरबार आज धान की बालियों से सजाया गया है। दूर दराज़ से आये किसानों ने मां के चरणों में अपनी फसल का पहला धान मां अन्‍नपूर्णा को अर्पित किया है। मंदिर के महंत की मानें तो हज़ारों वर्षों की ये परम्परा कालान्तर में खत्म हो गयी थी, जिसे दुबारा शुरू किया गया है। इसी मान्यता के अनुसार आज यह भव्य श्रृंगार किया गया है।

बता दें कि माता अन्नपूर्णा को प्रसन्न कर के घर में अन्न की कमी पूरी करने के लिए भक्तों द्वारा रखा जाने वाला 17 दिवसीय व्रत आज समाप्त हुआ है। इस व्रत की समाप्ति के बाद माता अन्नपूर्णा के दरबार में व्रती महिलाओं और पुरुषों का हुजूम उमड़ा है।

इस सम्बन्ध में बात करते हुए माता अन्नपूर्णा मठ मंदिर के महंत रामेश्वरपुरी ने बताया कि आज 17 दिवसीय 17 वर्षीय व्रत का उद्यापन हो रहा है। उन्होंने बताया कि हज़ारों वर्ष पहले काशी के राजा दिवोदास के समय जब अकाल पडा था, उस समय दिवोदास ने अपने धनञ्जय को आदेश दिया था कि माता अन्नपूर्णा को खुश करके इस आकाल को समाप्त करो। धनञ्जय ने तब 17 दिवस का कठिन तपोव्रत किया। उसके बाद मां अन्‍नपूर्णा ने उन्‍हें दर्शन दिया था। उसी परिपेक्ष्य में यह व्रत काशी अन्नक्षेत्र और काशी अन्नपूर्णा मंदिर में मनाया जाता है।

महंत रामेश्वरपुरी ने बताया कि ये परम्परा हज़ारों वर्ष पुरानी है, लेकिन कालान्तर में यह विलुप्त हो गयी थी। इसे हमारे पूर्वजों ने फिर से शुरू किया। इस व्रत में व्रती को 17 गाँठ वाला धागा धारण करना पड़ता है। व्रती को एक टाइम एक अन्न का आहार लेना पड़ता है। उसे मन, कर्म और वचन से शुद्ध आचरण करना होता है तथा 17 दिन का व्रत 17 वें दिन समाप्त कर माता अन्नपूर्णा को 17 व्यंजनों का भोग लगाना होता है। इसमें नमक निषेध होता है। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति यह व्रत 17 वर्ष करके इसका उद्यापन कर लेता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

मान्यता के अनुसार आज के दिन माता अन्नपूर्णा का धान से श्रृंगार किया जाता है। दूर दराज़ से किसान यहां आकर माता अन्नपूर्णा का धान से श्रृंगार करते हैं। आज दिन भर यह श्रृंगार ऐसे ही चलता रहेगा और शुक्रवार की सुबह से इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा। मान्यता है कि माता अन्नपूर्णा के चढ़े धान को खेत में, भण्डार में या अन्न के साथ मिलाकर रखने के बाद उसे जीवन भर कभी अन्न की कमी नहीं होगी।

मंदिर के महंत रामेश्वरपूरी ने बताया कि कलियुग में प्राण का वास अन्न में ही है। काशी अन्नपूर्णा क्षेत्र ट्रस्ट एक ऐसा ट्रस्ट है जो पूरे देश में रोज़ 5 से 10 हज़ार लोगों को नि:शुल्क भोजन प्रसाद ग्रहण करवाता है।

देखिये तस्वीरें 

Loading...