सड़कों पर घूम रहा है पागलपन, आखिर कब होगी मनोचिकित्सा

वाराणसी। आज विश्व मनोचिकित्सा दिवस है और लोग चारों तरफ जागरुकता अभियान चला रहे हैं पर क्या कभी इन जारुकता चलाने वालों ने सड़कों पर घूम रहे पागलपन का इलाज करने की हिम्मत की। सड़कों के कोनों पर, कूड़ेखानों पर यदा कदा पागल दिखना अब आम बात हो गयी है। कहीं आप को दौड़ाते तो कहीं ट्रैफिक संभालते तो कहीं खाकी ड्रेस में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हुए तो कहीं बिना तन पर कपडे के मुंह बिचकाते आप को देख ठहाके लगाते पागल। आखिर कब होगी इनकी मनोचिकित्सा ? इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता कोई भी पर आज के दिन जागरूकता रैलियां और सेमीनार ज़रूर होंगे लोग इसपर लंबा चौड़ा लेक्चर ज़रूर देंगे पर कब होगी मनोचिकित्सा?

ग़रीबों की सेवा कर अपना जीवन बिता रहे काशी के अमन कबीर से बात की तो उन्होंने बताया कि 5 साल से लगातार काम कर रहा हूँ। पहले हॉस्पिटल में काम करता था गरीब और दुखियारों के साथ अब फोन काल आने पर किसी भी क्षेत्र में निकल पड़ता हूँ। अमन ने बताया कि अभी तक जितनों की मदद की उनमे से 70 प्रतिशत औरतों और पुरुषों को लोगों ने मानसिक विक्षिप्त समझ मार पीट कर जख्मी कर छोड़ दिया था। किसी के घाव में कीड़े पड़े थे तो किसी के अंदर चलने तक की सकत न थी। सोचता हूं समाज में बड़े-बड़े चिकित्सक हैं जो पागलपन को ठीक करते हैं फिर इन गरीब दुखियारों का इलाज क्यों नहीं ?

शहर में डाक्टरों की फेहरिस्त लम्बी है जो मानसिक रोगियों का इलाज करते हैं। इनके अस्पतालों के बाहर उत्तर प्रदेश, बिहार, कोलकाता, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के मरीज़ों की लम्बी लाइने लगती हैं पर इनके अस्पताल के बाहर यदि कोई पागल या विक्षिप्त कूड़े में से कुछ निकालकर खाता दिख जाएगा तो इनके ही गार्ड उसे मारकर भगा देंगे।

क्यों ? क्योंकि इसके पास इलाज के पैसे नहीं हैं। मानसिक रोगी को समाज घर से निकाल देता है। वह सड़क पर दर-दर की ठोकरें खाता है पर कोई उसका इलाज नहीं करता फिर मानसिक चिकित्सा दिवस पर ऐसा ढोंग और स्वांग रचने का क्या फायदा। इससे यही प्रतीत होता है कि हमारा समाज मानसिक रोगी है और उसे इलाज की ज़रुरत है।

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