रंग लाएगी BHU प्रोफेसर और उनकी टीम की मेहनत, पश्‍चि‍मी देशों में मि‍लेगा आयुर्वेद को दवा का दर्जा

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संवाददाता : पवन गुप्ता ‘प्रभात’

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ने एक बार फिर बनारस का ही नहीं अपितु देश का नाम बुलंद करने की और कदम मज़बूती से बढ़ा दिए हैं। हम बात कर रहे हैं BHU के आयुर्वेद डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर जीपी दुबे की जिनके, नाम आयुर्वेद दवाओं के 10 से अधिक पेटेंट हैं।

इस बार प्रोफ़ेसर जीपी दुबे और उनकी टीम ने रिसर्च कर दो ऐसी दवाएं ईजाद की हैं, जिसे जल्द ही यूएस में भी दवा के रूप में डॉक्‍टरों द्वारा लिखा जायेगा। बता दें कि‍ अबतक आयुर्वेद की दवाओं को पश्‍चि‍मी देशों में फूड सप्‍लि‍मेंट के रूप में लेने के लि‍ये डॉक्‍टर मरीजों को लि‍खा करते थे। ये पहली बार होगा कि‍ आयुर्वेद की दवाओं को पश्‍चि‍मी देशों में भी दवा के रूप में पहचान मि‍लने जा रही है। इस सम्बन्ध में हमारे संवाददाता ने प्रोफ़ेसर जीपी दूबे से वि‍शेष बातचीत की।

प्रोफ़ेसर जीपी दूबे ने बताया कि ट्राइबल और हर्बल मेडिसिन भारत की धरोहर हैं। वैज्ञानिक विधि से इसकी वैश्विक स्थापना के लिए भारत सरकार ने 1 नेशनल फैसिलिटी सेंटर ट्राईबल एंड हर्बल मेडिसिन स्थापित कि‍या है, इसमें मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने का विश्वविद्यालय ने मौक़ा दिया।

प्रोफ़ेसर जीपी दूबे ने आगे बताया कि नेशनल फैसिलिटी केंद्र की स्थापना की पृष्ठभूमि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बहुत पहले साल 1991 में ही लिख दी गई थी। यूजीसी ने इसके लिए सेंटर ऑफ साइकोसोमेटिक स्थापित कि‍या जि‍सके बाद भारत सरकार ने 2008 में नेशनल फैसिलिटी बनाकर इस कार्य को बहुत आगे बढ़ाया है।

प्रोफ़ेसर जीपी दूबे ने बताया कि हमने पिछले 15 साल के रिसर्च के बाद दो ऐसी मेडिसिन बनायी हैं, जिसे जल्द ही पेटेंट मिलने के बाद इन दोनों दवाओं को यूएस में डॉक्टर भी ड्रग के रूप में लिखेंगे। उन्होंने बताया कि अभी तक यूएस में डॉक्टर्स आयुर्वेद मेडिसिन को फ़ूड सप्लीमेंट के रूप में लिखते थे पर अब इन दोनों दवा, जिसमें से एक न्यूरो की है और दूसरी डायबटीज़ की है, उसे दवा के रूप में पश्‍चि‍मी देश अपनाएंगे।

प्रोफ़ेसर जीपी दुबे ने मौजूदा सरकार की सराहना करते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने मार्च 2019 में औषधियों के ऊपर जो गाइडलाइन बनाई है, या यूं कहें कि‍ पुरानी गाइडलाइन्‍स को बदलकर फाइटोफार्मा में कार्य करने का जो अवसर दिया है, वह सरहानीय प्रयास है। इससे ड्रग डेवलपमेंट करना और उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बेसिक मान्यता प्रदान करना आसान हो गया है। उन्होंने सरकार की आयुष्मान योजना की भी सरहाना की।

बता दें कि प्रोफ़ेसर जी पी दुबे के 1980 से लेकर 2019 तक के आयुर्वेद और वैज्ञानिक कार्यों के सफर ने विश्वविद्यालय को और भारत को अनेकों यूएस पेटेंट और दसों ड्रग डोज इयर्स उपलब्ध कराए हैं। स्वास्थ्य के साथ रोजगार का भारत सरकार का जो मूल उद्देश्य है, उसकी पूर्ति करने में प्रोफेसर जी पी दुबे और काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नेशनल फैसिलिटी टीम पूरी तरह से दृढ़ है और यदि आगामी कुछ वर्षों तक इन्‍होंने कार्य किया, तो नि‍श्‍चि‍त रूप से भारत की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाले गांव और किसान के दोगुनी आय के लक्ष्‍य को प्राप्‍त कि‍या जा सकता है। आयुर्वेदि‍क दवाओं को पश्‍चि‍मी देशो में ड्रग के रूप में मान्‍यता मि‍लते ही भारत के हर्बल और ट्राइबल मेडि‍सि‍न की डि‍मांड में बूम आ सकता है, जि‍सका फायदा लाज़मी है कि‍ कि‍सनों को मि‍लना तय है।

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