यदुकुल के कन्धों पर रघुकुल का हुआ मिलन, संपन्न हुआ प्रसिद्ध भरत मिलाप

संवाददाता ध्‍यान चंद शर्मा और राजेश अग्रहरि‍ की ग्राउंड रि‍पोर्ट

वाराणसी। दुनिया का सबसे पुराना विश्व प्रसिद्ध नाटी इमली का भरत मिलाप हर्ष-उल्लास के साथ संपन्न हो गया। यदुकुल के कंधे पर रघुकुल को पुष्पक विमान से अयोध्या के लिए रवाना किया गया। चित्रकूट लीला समिति का यह भारत मिलाप लोगों ने अपनी आंखों मे कैद किया और भीगी आंखों से लीला स्थल से विदाई ली।

मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम स्वयं लीला के लिए पधारते हैं। शाम को लगभग चार बजकर चालीस मिनट पर जैसे ही अस्ताचल गामी सूर्या की किरणे भरत मिलाप मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ी तो माहौल थम सा गया और दौड़ पड़े राम और लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न से मिलने के लिए, जैसे ही चारो भाई गले लगे तो पूरा लीला स्थल हर हर के जयघोष से गूँज उठा।

धर्म की नगरी काशी में सात वार और तेरह त्यौहार की मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है की यहाँ पर साल के दिनों से ज्यादा पर्व मनाये जाते हैं। नवरात्र और दशहरा के बाद रावण दहन के ठीक दूसरे दिन यहां पर विश्व प्रसिद्द भरत मिलाप का उत्सव भी काफी धूम धाम से मनाया जाता है। शहर में इस पर्व का आयोजन कई अलग अलग स्थानों पर होता है लेकिन चित्रकूट रामलीला समिति द्वारा आयोजित ऐतिहासिक भरत मिलाप को देखने के लिए लाखो के भीड़ उपस्थित रही।

लगभग पांच सौ वर्ष पहले संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे। मान्यता है की उन्हें स्वप्न में तुलसीदास जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्ही के प्रेरणा से उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की। दशहरे के दूसरे दिन एकादशी को काशी के नाटी इमली के मैदान में भारत मिलाप का आयोजन होता है।

मान्यता है की 476 वर्ष पुरानी काशी की इस लीला में भगवान राम स्वय धरती पर अवतरित होते है। कहा ये भी जाता है की तुलसी दास जी ने जब रामचरित मानस को काशी के घाटों पर लिखा उसके बाद तुलसी दास जी ने भी कलाकारों को इकठ्ठा कर लीला यहा शुरू किया था। मगर उसको परम्परा के रूप में मेघा भगत जी ने ढाला। कहते हैं कि मेघा भगत को इसी चबूतरे पर भगवान राम ने दर्शन दिया था तभी से काशी में इस स्थान पर भरत मिलाप शुरू हुआ।

इस मेले को लक्खी मेल भी कहा जाता है। काशी की इस परम्परा में लाखों का हुजूम उमड़ता है भगवान राम, लक्ष्मण माता सीता के दर्शन के लिए शहर ही नहीं अपितु पुरे संसार के लोग उमड़ पड़ते है। वही परंपरा का निर्वाह काशी नरेश सदियों से करते चले आ रहे है बिना काशी नरेश के लीला स्थल पर आये लीला शुरू नहीं होती सबसे पहले महाराज बनारस लीला स्थल पर पहुँचते है।

एक तरफ भरत और शत्रुघ्न अपने भाईयों के स्वागत के लिए जमीन पर लेट जाते है तो दूसरी तरफ राम और लक्ष्मण वनवास ख़त्म करके उनकी और दौड़ पड़ते हैं। चारो भाईयों के मिलन के बाद जय जयकार शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार फिर चारो भाई रथ पर सवार होते हैं। यदुवंशी समुदाय के लोग उनके रथ को उठाकर चारो और घुमाते हैं।.

इस लीला को देखने के लिए क्या बच्चा क्या बुजुर्ग सबके मन में केवल एक ही श्रद्धा भगवान का दर्शन।सनातन संस्कृति को नजदीक से देखने के लिये भारत के कोने कोने से तो लोग आते ही वही यादव बंधू वर्षो से कई पीड़ियो से चली आ रही इस प्राचीन परम्परा का निर्वहन करते आ रहे है। साथ ही में प्रभु राम के परिवार के प्यार को अपने अन्दर आत्म सात करते है ! हर हर महादेव के जयघोष के साथ लोगों ने महाराज बनारस का अभिवादन किया और लीला स्थल से विदाई ली।

काशी की यह लीला लोग साल भर अपनी आँखों में संजो कर रखते है। भगवान स्वरुप पात्रो के बीच वे अपने आपको पाकर धन्य महसूस करते हैं। आज के वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में भागदौड़ की जिन्दगी के बीच आस्था के इस प्रवाह को देखने के लिए उमडे लोग इस सच को उजागर करते हैं। ईश्वर आज भी उनके मन में बसे हैं !

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