पंडि‍त वागीश शास्‍त्री से तांत्रि‍क दीक्षा हासि‍ल करने काशी आये फ्रांस के रोमैन बने रामानंद नाथ

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वाराणसी। वर्षों से विदेशी नागरिकों को भारतीय आध्यात्म और कुण्डलिनी जागरण की शिक्षा देने वाले पद्मश्री, यश भारती और बाणभट्ट सम्‍मानों से सम्‍मानि‍त आचार्य पंडि‍त भागीरथ प्रसाद त्रि‍पाठी वागीश शास्त्री की पाठशाला में एक बार फिर विदेशी नागरिक ने शिव मन्त्र की तांत्रिक दीक्षा हासिल की। फ्रांस नि‍वासी रोमन ने इसके बाद अपना नाम और अपना गोत्र भी बदल लिया। फ्रांस के रहने वाले रोमैन अब रामानंद नाथ हो गये हैं।

बता दें कि‍ भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी वागीश शास्त्री अपने वि‍देशी शि‍ष्‍यों के बीच बीपीटी वागीश शास्त्री के नाम से भी जाने जाते हैं। आप एक अंतरराष्ट्रीय संस्कृत व्याकरणज्ञ, उत्कृष्ट भाषाशास्त्री, योगी एवं तांत्रिक हैं।

गुरु वागीश शास्त्री ने बताया की तंत्र और मंत्र दोनों का संजोग करके मंत्र दीक्षा प्रदान की जाती है, वर्षों से पाश्चात्य देशों के लोग ज्ञान और आध्यात्म और शांति की खोज में मेरे पास आते हैं और मैं ईश्वर की कृपा से उनको उस मार्ग पर जाने का रास्ता निर्देशित करता हूँ। यह मार्ग भाव भक्ति और साधना का है और बिना समर्पण के कोई इस मार्ग पर नहीं जा सकता है।

रोमैन से रामानंद नाथ हुए फ्रांसीसी नागरि‍क ने बताया कि उनकी बहुत गहरी आस्था भारतीय धर्म और संस्कृति में काफी पहले से ही रही और 6 माह पूर्व गुरुदेव से कुण्डलिनी जागरण का प्रशिक्षण प्राप्त किया। उसके अभ्यास के बाद काफी शांति और ऊर्जा महसूस हुई. पुनः आने पर मैंने मंत्र दीक्षा ग्रहण करने का अनुरोध किया और गुरूजी ने आशीर्वाद दिया।

रामानंद नाथ ने बताया कि मैं अपने को बहुत ऊर्जावान और शक्ति से भरा महसूस कर रहा हूँ। दीक्षा प्रक्रिया का प्रारम्भ गणेश-अम्बिका, सप्त घृत मातृका और नवग्रह पूजन से प्रारम्भ हुआ गुरुपूजन, मंत्रदीक्षा और हवन की पूर्णाहुति के साथ संपन्न हुआ। पौरोहित्य कार्य पं शम्भुनाथ पांडेय ने करवाया।

संस्था के सचिव आशपति शास्त्री ने बताया की गुरूजी से मंत्र दीक्षा और कुण्डलिनी जागरण हेतु लोग लालायित रहते हैं परन्तु गुरुदेव योग्य और भाव से समर्पित व्यक्तियों को ही दीक्षा देते हैं। अब तक देश विदेश मैं तकरीबन 10 हज़ार से अधिक शिष्य इस विधि से साधना कर रहे हैं।

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