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महिषासुर के संहार के लिए त्रिदेव के तेज से उत्‍पन्‍न हुई थीं मां कात्‍यायनी
भगवान कृष्‍ण को पति स्‍वरूप पाने के लिए गोपियों ने की थी मां की पूजा

वाराणसी। शारदीय नवरात्र के छठवें दिन माता कात्यायनी के दर्शन करने का महत्व है। काशी में इस दिन सिंधिया घाट मोहल्ले में स्थित शक्ति स्‍वरूपा मां कात्‍यायनी के दर्शन किए जाते हैं। शारदीय नवरात्र के छठवें दिन जो भक्त मां दुर्गा की छठी विभूति कात्यायनी की आराधना करते हैं, मां की कृपा सदैव उनके ऊपर बनी रहती है। पति की चाहत में कुंवारी कन्याएं और सुहागिन अपने पति के दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं।

महर्षि कात्‍यायन से जुड़ी है कथा
शास्त्रों के अनुसार महर्षि कात्यायान की तप से प्रसन्न होकर आदिशक्ति उनके घर में पुत्री के रूप में अवतरित हुईं। ऋषि कात्यायन की पुत्री होने की वजह से माता कात्यायनी के रूप में प्रसिद्ध हुईं। शहर के सिंधिया घाट पर माता का मंदिर विराजमान है जहां आज शारदीय नवरात्र के छठे दिन श्रद्धालुओं का रेला उमड़ा है। एक और मान्‍यता के मुताबिक, महिषासुर के संहार के लिए त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश) के तेज से देवी की उत्‍पत्ति हुई थी। महर्षि कात्‍यायन ने उनकी प्रथम पूजा की। इस कारण से देवी का नामकरण कात्‍यायनी हुआ। मां ने महिषासुर का संहार कर तीनों लोकों को उसके संताप से मुक्‍त किया।

वृंदावन की भी हैं अधिष्‍ठात्री देवी
काशी के अलावा माता कात्‍यायनी की पूजा वृंदावन में भी होती है। यह वहां की अधिष्‍ठात्री देवी हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्‍ण को पति स्‍वरूप पाने के लिए गोपियों ने मां कात्‍यायनी की पूजा की थी। तभी से यह मान्‍यता है कि मनचाहा वर पाने और अपने सुहाग की रक्षा के लिए महिलाओं को मां कात्‍यायनी की पूजा करनी चाहिए।

सिंह की सवारी करती हैं मां
माता कात्‍यायनी देवी का रूप अत्‍यंत शीतलता देने वाला है। इन्‍हें शक्तिस्‍वरूपा भी कहा जाता है। इनका मुख त्रिदेव के तेज से सोने जैसा दमकता है। इनकी सवारी सिंह है और यह चार भुजाओं वाली हैं। दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। मां का निवासी आज्ञा चक्र में है। भक्‍त इस दिन साधना कर मां की कृपा पा लेते हैं।

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