अगहनी जुमा की नमाज़ के बाद ‘ईख’ खरीद घरों को रवाना हुए अकीदतमंद

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वाराणसी। इस समय हिन्दू कैलेण्डर का माह अगहन चल रहा है, मगर यह भी खूब है कि बनारस में मुस्लिम इस महीने के पहले जुमे को नमाज अदा करके आस्था को मिल्लत का रूप देते हैं। मुल्क में मिल्लत और अमन की दुआ के साथ 22 नवम्बर को पुराना पुल स्थित ईदगाह पुलकोहना में अगहन जुमा की नमाज़ अदा की गयी। इस नमाज़ के बाद मुस्लिम भाइयों ने फसल का पहला ईख (गन्ना) खरीदा और घरों की और रवाना हुए।

400 साल पुरानी है परंपरा
पर्व और त्यौहार की नगरी काशी में अगहनी जुमा पर आस्था का सैलाब ईदगाह पुलकोहना पर उमड़ा। मौक़ा था अगहनी जुमा की मुक़द्दस इबादत का। ऐसा भी नहीं कि भी नहीं की यह कोई नई परम्परा है, बल्कि इसकी तारीखी हकीकत सैकड़ो साल कदीमी (प्राचीन) है। कांग्रेस पार्षद हाजी वकास अहमद ने बताया कि अगहन माह की नमाज कब शुरू हुई इसका कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता, मगर सन 1600 ई से यह नमाज होती आ रही है।

बनारस में पड़ा था जबरदस्‍त आकाल
बुज़ुर्गों के के अनुसार बनारस में उस वक़्त जबरदस्‍त आकाल पड़ा था, सारे किसान और कारोबारी परेशान थे। इसे देखते हुए उस समय अगहनी जुमा पढ़ी गयी और उसके बाद चारों तरफ खुशहाली फ़ैल गयी। तभी से यह परमपरा चली आ रही है। यहाँ पूरे पूर्वांचल से लोग नमाज़ अदा करने और किसान गन्ना बेचने आते हैं।

हिन्‍दुओं की दुकान से होती है खरीददारी
उन्होंने बताया कि यह भी एक परम्परा है कि नमाज के दौरान हिन्दू भाइयों की ओर से साल की पहली फसल गन्ने की दुकान लगाई जाती है, जहां से नमाज अदा करके निकलने वाले गन्ने की खरीदारी करते हैं।

आज रहती है मुर्री बंद
नमाज़ी इश्तियाक अंसारी ने बताया कि आज हमारे लूम (मुर्री) बंद रहते हैं। सभी अगहनी जुमा की नमाज़ पढ़ने आते हैं। यहां तक की बाईसी के सरदार और सभी महतो भी आज के दिन यहां इकट्ठा होते हैं और देश और शहर के मौजूदा हालात पर नमाज़ के बाद दुआ के साथ साथ चर्चा करते हैं।

सिर्फ बनारस में ही होती है विशेष नमाज
ईदगाह पुलकोहना के आसपास मेले जैसे माहौल अगर है तो ये बुजुर्गों की देन है, न उन्होंने ऐसी परम्परा शुरू की होती और न ही हम लोग उनकी मिल्लत को आगे बढ़ा पाते। वाराणसी में लाखों बुनकर नमाज अदा करते हैं। आखिर यह अगहनी जुमा कब शुरू हुआ इसका कोई साबित इतिहास नहीं है। क्षेत्र के बुज़ुर्ग फखरुद्दीन अंसारी ने बताया कि माना जाता है कि अगहनी जुमे की नमाज़ पढने का दौर बादशाह अकबर के ज़माने से चला आ रहा है। इस जुमे की नमाज़ की खास बात ये है की हिंदुस्तान में सिर्फ बनारस में ही यह नमाज़ अदा की जाती है।

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