ग़रीबों को चैन की नींद सुलाता है बनारस का ये अनोखा बैंक, रोज़ बदल जाते हैं खाताधारक

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संवाददाता : पवन गुप्ता 

हज़ारो गरीब रोज़ बनारस की गलियों और सड़कों पर भूखे पेट सोते हैं
ऐसे ग़रीबों का मसीहा बना है बनारस का ‘रोटी-बैंक’
वाराणसी के दो दोस्त मिलकर चलाते हैं ‘रोटी बैंक’, रोज़ मिटाते हैं गरीबी की भूख
साल 2017 से ‘जय और वीरू’ की ये जोड़ी ग़रीबों को खिला रही है खाना
इस बैंक में नहीं जमा होता आधार कार्ड या फिर पैन कार्ड, रोज़ बदल जाते हैं खाताधारक

वाराणसी। ‘भूख ने निचोड़ कर रख दिया है जिन्हें, उनके तो हालात ना पूछो तो अच्छा है।’ किसी शायर ने ग़रीबों के हालात पर ये शेर लिखा तो शायद उसका भी क़लम रोया होगा। शायद उसने भी उनकी भूख को करीब से देखा होगा। ऐसे ही हज़ारो गरीब रोज़ बनारस की गलियों और सड़कों पर भूखे पेट सोते हैं और सच है कोई उनका हाल भी नहीं पूछता, पर बनारस में ‘जय और वीरू’ की जोड़ी इन ग़रीबों का रोज़ हाल भी पूछती है और इनकी भूख का इंतज़ाम भी करती है।

बनारस के ये ‘जय और वीरू’ का रोटी बैंक रोज़ नए खाताधारक बनाता है और सड़क किनारे गलियों में सो रहे ग़रीबों को चैन की नींद सोने की आज़ादी देता है।

हमारे विशेष संवाददाता ने बनारस में साल 2017 से चल रहे रोटी बैंक के संचालक किशोर कान्त तिवारी ( जय) और रौशन पटेल ( वीरू) से विशेष बात की। पेश है इस रोटी बैंक पर ख़ास रिपोर्ट…

चार सालों से चल रहा है ये अनोखा बैंक
‘साल 2017 में सड़कों पर सो रहे गरीब असहायों को देख मन विचलित हो गया। हम भरपेट भोजन करके घर में सोते हैं और ये गरीब दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करके सड़कों पर भूखे पेट सो रहे हैं, बीएस यही बात मुझे विचलित कर गयी और रोटी बैंक की शुरुआत हुई।’ ये शब्द हैं रोटी बैंक के संचालक किशोर कान्त तिवारी के हैं।

सबको मिलता है निशुल्क खाना
किशोर कान्त तिवारी ने बताया कि हमारे शहर में हज़ारों लोग रोज़ सड़क के किनारे भूखे पेट सो जाते हैं। कुछ अस्पतालों में मरीज़ों को लेकर आये हुए परिजन होटल बंद होने की वजह से भूखे रह जाते हैं। ऐसे लोगों को निशुल्क खाना खिलाने के लिए हमने रोटी बैंक की शुरुआत साल 2017 की थी। तब से शुरु हुआ हमारा सफर अनवरत चला आ रहा है।

कोई भी दे सकता है भोजन
किशोर ने बताया कि रोटी बैंक में कोई भी भोजन जमा करवा सकता है। हम पार्टी, होटल, रेस्टोरेंट, हॉस्टल और घरों में बचे हुए खाने ग़रीबों में बांटते हैं। इसके अलावा कुछ घर ऐसे हैं जहां से हमें रोज़ चार से पांच आदमी का भोजन मिलता है। हम उसे रात के अँधेरे में सड़क किनारे लोगों को खिला देते हैं।

भूखे पेट सो रही इंसानियत का भर रहे पेट
रोटी बैंक के जय- रौशन पटेल ने बताया कि यह बैंक ग़रीबों का बैंक है और इसमें ग़रीबों की रोटी सहेजी जाती है। हमारा काम है भूखे पेट सो रही इंसानियत का पेट भरना ताकि देश में और समाज में इंसानियत जागती रही। लोग एक दुसरे से मिलकर रहें।

‘वो राम की खिचड़ी भी खाता है, रहीम की खीर भी खाता है। वो भूखा है जनाब उसे, कहाँ मजहब समझ आता है।’ शायर की ये लाईने शायद रोटी बैंक की की आवश्यकता समझने के लिए काफी है। काशी के ये ‘जय और वीरू’ लोगों को रोज़ भोजन करवा रहे हैं और आम इंसान इनकी प्रशंसा भी कर रहा है।

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