काशी के अनूठे रंग : एक तरफ नमाज़े मगरीब तो दूसरी तरफ मानस की चौपाइयां

लाट भैरव मंदिर और लाट की मस्जिद के चबूतरे पर जीवंत हुई गंगा जमुनी तहज़ीब
मगरीब की अज़ान के साथ हुआ 476 साल पुरानी रामलीला का मंचन
लाट भैरव रामलीला समिति के इतिहास में यह 350 वां मौक़ा था जब नमाज़ और रामलीला एक साथ हुई

वाराणसी। गंगा जमुनी तहज़ीब के लिए पूरे विश्व में जाना जाने वाला शहर बनारस अपने अनूठे रंगों के लिए मशहूर है। मिल्लत के एहसास को और मज़बूत कर रही है वाराणसी में 476 साल से हो रही गोस्वामी तुलसीदास के समकक्ष मेघा भगत की लाट भैरव रामलीला। मंगलवार को इस रामलीला के दौरान लाट भैरव मस्जिद में अज़ान हुई तो इसी मस्जिद के दूसरे छोर पर बने लाट भैरव मंदिर पर हो रही रामलीला में नारद बने पात्र ने ढोलक और मजीरे की थाप पर रामचरित की चौपाइयां पढ़ मुल्क को अमन का पैगाम दिया। मंदिर और मस्जिद का एक ही चबूतरा है जिसपर एक तरफ नमाज़ तो दूसरी तरफ रामलीला का मंचन हर वर्ष होता है।

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शहर में लाट भैरव मंदिर और मस्जिद का चबूतरा, शाम के साढ़े पांच बजे मस्जिद में मुअज़्ज़िन ने अज़ान दी तो इसी चबूतरे पर हो रही लाट भैरव रामलीला समिति की रामलीला में ढोल-मजीरे की थाप पर रामचरित मानस की चौपाइयों के बीच नारद मुनि और भगवान श्रीराम का संवाद भी चल रहा है। खुदा की बंदगी में मशगूल बन्दए खुदा और भगवान की लीला को देख मंत्रमुग्ध लीला प्रेमी एक ही चबूतरे पर बैठे हैं।

अज़ान ख़त्म हुई और शहर के अमन के निगहबान बनारसी एक बार फिर लीला देखने के लिए सिमट आये। बच्चे पहले से ही इस लीला को देख समझने और जानने की कोशिश में लगे थे। तभी नारद मुनि ने रामचरित मानस की चौपाइयां ‘सीता चरण चोंच हति भागा, मूढ़ मंदमति कारन कागा’ सुन मुस्कुरा दिए। गोस्वामी तुलिस दास के समकालीन मेघा भगत द्वारा साल 1533 में यह रामलीला शुरू की थी।

रामलीला नमाज़ के पहले से शुरू हुई और नमाज़ के खत्म बाद तक हुई। सजद-ए-शुक्र के बाद रामलीला देखने के लिए बैठे रागिब अंसारी जिनकी उम्र 70 बसंत देख चुके हैं। रागिब ने बताया कि ‘मुग़ल बादशाह औरंगजेब बनवाईस रहा ई मस्जिद, अब्बा बताइन रहे, बचपन में भी देखा रहा रामलीला नमाज के साथ आजो देख रहेन हैं।’

लीला समिति की माने तो यह 350वां संयोग था रामलीला के नमाज़ के साथ होने का। नमाज़ के कुछ ही देर बाद रामलीला का प्रसंग भी ख़त्म हुआ और मुल्क में अमन और चैन की दुआ करते हुए राम-रहीम एक-दूसरे के गले में हाथ डाले अपने-अपने घरों को रवाना हो गए।

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