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वाराणसी। इस्‍लाम में पांच फर्ज हैं कलमा, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज। हर साल रमजान के पवि‍त्र माह में दुनि‍याभर के मुस्‍लि‍म रोजा रखकर अपने इस फर्ज की अदायगी करते हैं। अमूमन ज्‍यादातर मुस्‍लि‍म रोजा रखने के दौरान कम से कम शारीरि‍क श्रम करने और ज्‍यादा से ज्‍यादा खुदा की इबादत के लि‍ये वक्‍त देने को तरजीह देते हैं।

इस बार का रोजा है सबसे अलग
मगर इस बार का रोजा अबतक के हर रमज़ान से अलग है। कोवि‍ड-19 संकट के दौरान दीनी फर्ज के साथ साथ बड़ी संख्‍या में मुसलमान दुनि‍यावी फर्ज भी अदा करने में पीछे नहीं हैं। वाराणसी में भी ऐसे कोरोना वारि‍यर्स की संख्‍या काफी है जो इस संकट काल में अपनी सेवा के साथ साथ एक महीने का रोजा भी रखे हुए हैं। इन्‍हीं में से एक हैं वाराणसी के जि‍लाधि‍कारी के ड्राइवर अब्‍दुल वसीम सि‍द्दि‍की।

Live VNS से वि‍शेष बातचीत
52 वर्षीय अब्दुल वसीम सिद्दि‍की जो कि मौजूदा समय में डीएम कौशल राज शर्मा के वाहन चालक यानी ड्राइवर हैं। Live VNS से वि‍शेष बातचीत में अब्दुल वसीम सिद्दीकी ने बताया कि‍ वह 1988 से कलेक्ट्रेट में ड्राइवर के पद पर तैनात हैं। शुरुआत में एसडीएम फि‍र एडीएम की गाड़ी चलाने के बाद पि‍छले पांच साल से वे केवल वाराणसी के जिलाधिकारी की गाड़ी को ड्राइव करते हैं।

हमारा काम ही ऐसा है
अब्‍दुल वसीम सि‍द्दि‍की बताते हैं, कोरोना कॉल में रोजा रखकर नौकरी करना मेहनत भरा काम तो है ही, कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि सही समय पर ड्यूटी से ना छूट पाने के कारण नमाज भी छूट जाती है, लेकिन हमारा काम ही कुछ ऐसा है। हालांकि‍ जि‍लाधि‍कारी साहब खुद हमें शाम को चार बजे छोड़ देते हैं और बाकी के स्‍टाफ को भी कह रखा है कि‍ सि‍द्दि‍की को समय पर छोड़ दि‍या करें ताकि‍ इनकी नमाज़ न छूटे।

हमारे लि‍ये तो दोनों ही फर्ज जरूरी हैं
अब्‍दुल वसीम सि‍द्दि‍की के अनुसार, हमें अपनी ड्यूटी का फर्ज तो हर हाल निभाना है। हमारे लि‍ये तो दोनों ही फर्ज जरूरी हैं। एक फर्ज ड्यूटी का है, जिसमें हम कहीं न कहीं समाज के लि‍ये छोटी ही सही मगर अपनी जि‍म्‍मेदारी नि‍भा रहे हैं, इसी से हमारा और हमारे परि‍वार का पेट भी चलता है। दूसरा फर्ज इस्‍लाम का है, जि‍सके तहत हम रोज़ा रखते हैं। हर रोज जब हम नमाज़ अदा करते हैं तो खुदा से यही मांगते हैं जल्‍द से जल्‍द इस कोरोना बीमारी से दुनि‍या को नि‍ज़ात मि‍ले और हम पहले की तरह एक दूसरे से घुल मि‍लकर रहें।

कभी कभी घबराहट सी महसूस होती है
अब्दुल वसीम बताते हैं कि‍ रमजान में रोजा रखने के दौरान दोपहर के बाद कभी कभी घबराहट सी महसूस होती है। छटपटाहट होती है, शरीर में हलचल होती है, लेकिन ऊपर वाले का नाम लेकर अपने आप को ढाल लिया जाता है।

कभी कि‍सी हॉटस्‍पॉट में तो कभी दीन दयाल अस्‍पताल
कोरोना काल में जब प्रशासनि‍क अधि‍कारी अपने एसी ऑफि‍स के चेम्‍बर को छोड़कर गली-गली, गांव गांव घूम रहे हैं तो ज़ाहि‍र सी बात है कि‍ इस काम में उन्‍हें लाने ले जाने की ड्यूटी उनके ‘सारथी’ या यूं कहें कि‍ वाहन चालक ही नि‍भा रहे हैं। दि‍न हो या रात कि‍सी भी वक्‍त अधि‍कारि‍यों के ड्राइवर पूरी मुस्‍तैदी के साथ अपने अपने अधि‍कारि‍यों को एक जगह से दूसरी जगह तक लाने ले जाने का काम कर रहे हैं। वहीं वाराणसी के जि‍लाधि‍कारी कौशल राज शर्मा जो कि‍ कोरोना काल में लगातारा शहर के वि‍भि‍न्‍न इलाकों का दौरा कर रहे हैं, तो इनके साथ साथ ड्राइवर अब्‍दुल वसीम सि‍द्दि‍की भी एक्‍सलेटर, ब्रेक, क्‍लच और स्‍टेयरिंग संभाले हुए हैं। सि‍द्दि‍की कभी जि‍लाधि‍कारी के साथ हॉटस्‍पॉट एरि‍या में होते हैं तो कभी इन्‍हें दीन दयाल उपाध्‍याय अस्‍पताल पहुंचना होता है।

कोरोना काल में बड़ी जि‍म्‍मेदारी है
कोरोना जैसी संक्रामक और खतरनाक बीमारी के बीच रमजान के महीने में भूखे प्‍यासे अपनी ड्यूटी नि‍भाना और वो भी जि‍ले के सबसे बड़े अधि‍कारी को पूरी सुरक्षा के साथ लाना ले जाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है, जि‍से हर रोज़ अपनी सबसे अहम जि‍म्‍मेदारी मानकर अब्‍दुल वसीम सि‍द्दि‍की साहब नि‍भा रहे हैं।

परि‍वार में हैं एक बेटी और दो बेटे
अब्‍दुल वसीम सि‍द्दि‍की इससे पहले पूर्व जि‍लाधि‍कारी योगेश्‍वर राम मि‍श्र और सुरेन्‍द्र सिंह के भी ड्राइवर रह चुके हैं। सि‍द्दि‍की साहब के दो बेटे व एक बेटी हैं। बेटी एमबीए करने के बाद प्राइवेट जॉब कर रही हैं, तो उनसे छोटे बेटे 20 वर्षीय साहिल बीकॉम करने के बाद एक प्राइवेट जॉब कर रहे हैं। तीसरे पुत्र आदिल वसीम अभी इंटर की पढ़ाई कर रहे हैं।

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