विश्व दिव्यांगजन दिवस : बनारस के इस गरीब दिव्यांग पति‍-पत्‍नी का हौसला देख आप भी कहेंगे…वाह !

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वाराणसी। ‘इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है, नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।’ मशहूर कवी दुष्यंत कुमार की यह कविता सोए हुए समाज को जगाने के लिए है, पर समाज को जगाने और साहस से रौशन करने का बीड़ा उठा रखा है बनारस के दिव्यांग पति-पत्नी ने।

जन्म के बाद दिव्यांग हुए सुनील कुमार जायसवाल और सीमा जायसवाल उस समाज के लिए आईना हैं जो थोड़ी सी मुश्किल में घबरा जाते हैं। पेश हैं विश्व दिव्यांग दिवस पर एक खास रिपोर्ट…

मुस्कुराना उसका स्वभाव है और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार भी रहते हैं जबकि उनके पास पैसों की कमी है। हम बात कर रहे हैं हुकुलगंज निवासी जायसवाल की, सुनील दोनों पैरों से दिव्यांग है पर उनकी मानसिकता और सोच सभ्य सामज में फैली मानसिक दिव्यांगता कम करने के लिए काफी है। हम जब सुनील से मिलने पहुंचे तो वो अपनी ट्राई साईकिल से सबका अभिवादन करते अपनी छोटी सी पान की दुकान की तरफ बढ़ रहे थे।

हमारे संवाददाता राजेश अग्रहरि ने रोका और खबर के लिए बात की तो पहले ठिठके फिर मुस्कुराये और कहा चलिए घर चलें। एक छोटे से घर के पास आकर उनकी ट्राई साइकिल और वो उतरकर अंदर गए और फिर हमारे संवाददाता को भी बुलाया। अंदर जाने पर तीन बच्चों ने लगातार नमस्ते की बौछार लगा दी तभी उनकी दिव्यांग पत्नी सीमा जायसवाल भी आ कर हमारे साथ बैठ गयीं। सुनील से हमने बात शुरू की तो उनका दर्द भी छलका और सरकारी उदासीनता भी।

बचपन में अचानक से आये बुखार ने बदली ज़िन्दगी
सुनील ने बताया कि उनके पिता जी बताते थे कि जब वो डेढ़ साल के थे तो उन्हें बुखार आया और फिर पिता जी डॉक्टर के यहाँ दौड़ पड़े कई डाक्टरों के इलाज के बाद एक डॉक्टर की दवा से आराम तो मिला पर पैर में दिव्यांगता आ गयी और दोनों पैर की जान ख़त्म हो गयी। उस दिन से मैं खुद के पैर पर खड़ा नहीं हो पाया।

चलाते हैं पान की दुकान
सुनील हुकुलगंज-पांडेयपुर मार्ग पर एक छोटी से गुमटी में पान की दुकान चलाते हैं और उसी से किसी तरह अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। इससे उनके तीन बच्चे और परिवार का भरण पोषण होता है।

सरकार से हैं निराश
सुनील भी सरकार से निराश हैं। उन्होंने बताया कि मैं दिव्यांग, मेरी पत्नी भी दिव्यांग पर सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती हमें। यहां तक की राशन कार्ड भी हमारा नहीं बनाया गया। गरीब हूं फिर भी आयुष्मान योजना का न तो लाभ मिला है और ना ही कार्ड बना है।

सोचकर भी नहीं पढ़ा पा रहे बच्‍चों को
सुनील और सीमा के तीन बच्चे हैं जिसमे सबसे बड़ा 4 साल का है। उनसे जब उनके स्कूल जाने के बारे में बात की गयी तो सुनील ने बताया कि स्कूल भेजना तो चाहते हैं पर पैसा नहीं है कि उन्हें स्कूल भेज पाएं हम।

एहसास से रखती हूं ख़याल
सीमा जायसवाल की शादी सुनील से साल 2012 में हुई थी। सुनील और सीमा के तीन बच्चे हैं। सीमा से जब पूछा गया कि आप बच्चों का ख्याल कैसे रखती हैं तो बोली की उनके एहसास से उनमे अंतर के साथ साथ उनका ख्याल भी रखती हूं। उनको तैयार करना उनका खाना बनाना और खिलाना सब करती हूँ।

सरकार दे ध्यान
सीमा ने भी सरकार से उनके ऊपर ध्यान देने की बात कही ताकि वो अपने बच्चों को पढ़ा लिखा सकें।

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