विज्ञापन

शनिवार की शाम बनारस में अजीब सा माहौल हो गया था। साल का आखिरी लगन था, लोगबाग तैयार होकर शादियों में जाने को थे कि सोशल मीडिया पर अचानक ही एक खबर दौड़ पड़ी कि तेलियाबाग की एक बिटिया को बदमाशों ने अगवा किया, गैंगरेप किया और मार डाला। इसके बाद लाश चौबेपुर में गंगा नदी में फेंक दी। मोहनिया, हैदराबाद और उन्नाव की घटनाओं पर आह कर रहे बनारसी लोगों के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था।

विज्ञापन

बनारसी मन सोच में पड़ा था कि हमारे शहर को ये क्या हुआ !! कुछ कोशिश में थे कि घटना के बारे में सही-गलत की जानकारी कर सकें। मगर तब तक सोशल मीडिया रूपी तलवार उठाकर हवा में लहराने वालों की जैसे बाढ़ आ गई। इन लोगों ने न सिर्फ उस लड़की का नाम और तस्वीरें वायरल कीं। बल्कि घटना के बारे में भी ऐसे लिखा जैसे उनकी आंखों के सामने ही सबकुछ हुआ हो। तेलियाबाग तिराहे पर चक्काजाम किया गया जिसे संभालने में पुलिस को घंटों लगे। हालांकि 24 घंटे की तफ्तीश में अब काफी कुछ साफ हो चुका है।

विज्ञापन

यह बात इस घटना को लेकर नहीं है मगर ऐसी तमाम छोटी-छोटी घटनाएं हैं जिन्हें सोशल मीडिया के जरिए बड़ा और वीभत्स बताने की कोशिशें की गईं। बीएचयू में छात्राओं के आंदोलन के बाद से शुरू हुआ सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब वहां तक पहुंच चुका है जिसे खतरे का निशान कहना गलत न होगा। ये खतरा है बनारस शहर की मस्तमिजाजी के लिए, यहां की शांति और सौहार्द्र के लिए, यहां की गंगाजमुनी तहजीब के लिए।

विज्ञापन

नि:संदेह सोशल मीडिया आम जनता का प्लेटफार्म है जहां से वह अपनी बात जिम्मेदारों तक पहुंचा सकती है। मगर इसके साइड इफेक्ट्स भी हैं। पिछले कुछ समय में सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स का कुछ लोगों ने खतरनाक ढंग से इस्तेमाल किया है। जाहिर है वो लोग सरकारों और व्यवस्था से नाखुश और नाराज हैं। निश्चित तौर पर लोकतंत्र में नाखुशी और असंतोष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

विज्ञापन

मगर व्यवस्था को सुधारने के बजाय अशांति और अव्यवस्था फैलाने की कीमत पर कतई नहीं।
उसपर भी बात अगर अपने बनारस की हो तो यह अपराध अक्षम्य हो जाता है। हम बनारसी आज सारी दुनिया में इसी अलमस्ती के कारण सिर उठाकर चलते हैं। देश दुनिया से लोग बनारस को समझने, इसे जीने चले आते हैं। और हमारे बीच ही कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी विशेष धारणा से प्रभावित हो इस शहर की ऐसी की तैसी करने पर लगे हुए हैं।

ऐसा नहीं है कि बनारस में अपराध नहीं होते। छेड़खानी या दुष्कर्म की घटनाएं नहीं होतीं। मगर शहरी लोगों के सामने किसी की मजाल है जो किसी बहन-बेटी पर फब्तियां कस ले। शोहदे चौराहों पर इसी शहर में पीटे जाते हैं और गली-मोहल्लों में गलत नीयत से घुसने वाले इसीलिए सहमे रहते हैं। कुछ घटनाएं बदनुमा दाग जैसी जरूर हैं मगर इनका दोष भी हम बनारसी अपने सिर ही लेते हैं। हममें से कई लोग कई बार मौके पर विरोध नहीं कर पाते, शोहदों का मुंह नहीं तोड़ पाते, लोकलाज में शिकायत नहीं कर पाते। और शायद इसी झिझक का फायदा उठाकर कुछ लोग अपने सियासी मंसूबों को सोशल मीडिया के जरिए पूरा कर रहे हैं और इस शहर की इज्जत को खाक में मिलाने पर तुले हैं।

दुनिया में दो तरह के लोग होते है। एक जो उम्मीदों पर जीते हैं और दूसरे जो आशंकाओं पर। अपनी अलमस्ती और फक्कड़पन के लिए मशहूर बनारस यूं तो उम्मीदों पर जीता रहा है मगर यहां भी आशंकाओं के कुछ बाशिंदों ने अपना घर बना लिया है। हालांकि यह काशी है। किसी को ना नहीं कहेगी। यह किशन महाराज और बिस्मिल्लाह का शहर है जिन्होंने बड़े-बड़े प्रलोभनों को गंगा और एक बीड़ा पान के लिए लात मार दी। इसलिए जनाब आपसे गुजारिश है कि अपनी पसंद-नापसंद और नफे-नुकसान के लिए इस शहर की आत्मा न मारिए…


लेखक अभिषेक त्रिपाठी, वरिष्‍ठ पत्रकार एवं स्‍तंभकार है, कई प्रतिष्‍ठित मीडिया हाउस से जुड़े रहे हैं।


 

विज्ञापन
Loading...