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लेखक अभि‍षेक त्रि‍पाठी वाराणसी के वरि‍ष्‍ठ पत्रकार है।

‘सब चट्टी-चाउराहा वीरान भयल हौ, बहरे निकसे बदे चप्पल पहिना त घरे वाले टोकत हउवन – करे कहां जात हउवे…। चच्चा बतावा यहू कौनो बात भयल। पहिले घरे रहा त निकम्मा, बहरे निकला त आवारा। अब सब कोई हड़कावत हौ घरे में- कहीं जईहे मत बे…’ किसी तरह आंखें चुराकर घर से निकला बिट्टू मोहल्ले के बुधई चाचा से अभी अपना दुख रो ही रहा था कि चाचा जोर से चिल्लाए… ‘अरे भाग सारे पुलिस आयल, कल संझा के सुरेसवा सेंकायल हौ घाटे पर’। चाचा ने गली का रुख करते हुए बिट्टू को संक्षेप में समझाया, ‘बेटा, ई बखत यही सही हौ कि घरे से मत निकल। सरवा चिनिया सब आपन जुलाब सब दुनिया में फइला देले हउवन।’

तो ये बानगी है चट्टी-चौराहों का जीवन जीने वाली काशी के मोहल्लों में मौजूदा हाल और यहां के बाशिंदों की बेकली की।

बनारस शहर के लोग सामाजिकता में कुछ इस कदर घुले हैं कि पूरा मोहल्ला चच्चा होता है या बब्बा, 14 साल का छोकरा मोहल्ले के अपने किसी भतीजे की मेहनत पर दादा बन जाता है तो पांच बरस की बच्ची भी बुआ होती है किसी न किसी की। व्यावसायिक जीवन में हर कोई दुकान दौरी या नौकरीपेशा वाला है, मगर त्योहार या छुट्टियों पर वो भी काफी समय इन अड़ियों पर व्यतीत करता है और उसको अपने इस बनारसीपन पर घमंड भी है। जो निकम्मे या मौसमी कारीगर हैं, उनका तो आधा जीवन इन्हीं अड़ियों के इर्दगिर्द गुजरता है। यहीं से उन्हें रोग की दवा मिलती है और यहीं से काम-धंधे को आगे बढ़ाने का गुरुमंत्र…

लेकिन इन दिनों बनारस एक अजब सी दुविधा में है। अपने सांसद और देश के पीएम के कहने पर उन्होंने एक दिन का जनता कर्फ्यू मान तो लिया लेकिन रोज-रोज का ये सन्नाटा अखर रहा है उन्हें, यह जानते हुए कि खतरा बड़ा है और अदृश्य भी…मगर क्या करें जनाब, आदत नाम की भी तो एक चीज है न दुनिया में!!

बनारसी मन स्वभावतः बहिर्मुखी होता है। अखाड़े में एक नंबर की जोड़िया फेरने से लेकर कक्षा 2 में बच्चे के अच्छे नंबरों तक को वो इन अड़ियों पर आकर, सीना फुलाकर बताना चाहता है। वो आदी हो चुका है यह जताने का कि ऑफिस में जब बॉस ने उसको झाड़ लगाई तो कैसे उसने पलट के जवाब दे दिया। देर से आने पर गद्दी मालिक ने पैसे काटे तो कैसे उसने बाकी रुपये भी उसके मुंह पे मारकर कहा कि ‘ले, अपने ऊहां डाल लें’। अब हालात यूं हैं कि मन तो उसका भी डरा हुआ है लेकिन कदम हैं कि रुक ही नहीं पा रहे।

हमारे एक विकास बाबू हैं। विकास गुप्ता हैं और वीर भी, इसलिए ‘गुप्तवंशैकवीर’ कहे जाते हैं। धीरे से बोलने वाले हैं मगर रह रह कर फूट पड़ रहे हैं। कहते हैं कि जाम में ये सड़कें कितनी अच्छी लगती थीं, मजा ही नहीं आ रहा कि गाड़ी फट से शहर के ए कोना से ओ कोना पहुंच जा रही है। तमाम ऐसे हैं जिन्होंने अपना शब्द भंडार (गालियों का पिटारा) खोल रखा है। बात बेबात दो-चार शब्द उछाल दे रहे हैं उसमें से चीन की तरफ मुंह करके…उनका कहना है कि ‘हमहने त जिंदगी भर मलाई अ रबड़ी से ऊपर नहीं गइली, ई नेपलियन (काशी में चीन, जापान, कोरिया जैसे देश के नागरिकों का प्यार का नाम) चिमगादड़ क सूप पी पी के नास कर देलन सब!!’

इस सदा मस्त रहने वाले शहर के दुःख घर-गृहस्थी से हटकर थोड़े अनोखे टाइप के हैं…
गोदौलिया पर जाम की जगह सन्नाटा पसरा है तो रात दो बजे भी गुलजार रहने वाले मैदागिन चौराहे पर दोपहर के 12 बजे सियार लोट रहे हैं। घाटों पर भी कोने-अंतरे जमा होने वालों को पुलिस वाले (अब तो) खदेड़ ले रहे हैं। सुक्खू चचा का तीन दिन से पेट साफ नहीं हो रहा क्योंकि सुबह की चाय घर पर पीनी पड़ रही है तो बृजेश भैया को रात में नींद नहीं आ रही क्योंकि रात को सोने से पहले वाला केशव का पान वो नहीं जमा पा रहे।

सारी बेचैनी के बावजूद ये जरूरी है कि सभी खुद अपना ख्याल रखें। शायद बनारसियों के मन में भी ये बात है कि कोरोना की चपेट में आने से खतरा सिर्फ उन्हें नहीं बल्कि उनके परिवार और संगी साथियों को भी है। मन को वो मना रहे हैं और सड़कों पर पसरा सन्नाटा इसका सबूत है। बस कुछ हैं जिन्हें निकम्मा से ज्यादा आवारा कहलाना पसंद है। हालांकि वो भी साथ के अभाव में ज्यादा देर बाहर नहीं निकल पाएंगे। वो क्या है न, कि कुछ गाड़ियां गड्डमड्ड ही चलती हैं!!

90+ सावन देख चुके बाबूलाल चचा इसको अनुभव की कसौटी पर कसते हैं…’देखा बच्ची, राममंदिर वाला कर्फ्यू तू लोग देखले होबा। हम ओसे पहिले क भी बहुत कुछ देखली। पहिले अइसन भी रहल कि हैजा, चेचक, पीलिया, मलेरिया, प्लेग से गांव क गांव साफ हो जात रहलन। कौनो घर अइसन नाहीं रहल जहां एकाध बच्चन क बलि कौनो रोग नाहीं लेहले रहल। ई सब बीमारी क तब दवा न रहल, कुछ रहल त बस सावधानी आउर पूजा-पाठ। माई लोग ब्रत रखें लड़कन बदे, दादी-बब्बा मनौती माने आउर लिया लिया के गंडा बांधें सभने के… समझ ले कि वही समय लउटल हौ। गांव-मोहल्ला तब क बिपत्ति में एक साथ खड़ा रहे, सब बीत जाए पर सब एक साथ शादी-बियाह तर-त्योहार भी मनावें। अब क जरूरत हौ दूर-दूर रहे क… ऊ का कहल जात हौ सोशल डिस्टेंसिंग। मोतीजी (मोदीजी) कहत हउवन त ओकर पालन करा लोग 21 दि‍न ले। सब ठीक हो जाई त फिर मउहर खेल लिहा साथे में…’

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